अश-शुआरा · 213/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
فَلَا تَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتَكُونَ مِنَ الْمُعَذَّبِينَ ۝٢١٣
Falaa tad`u ma`al laahi ilaahan aakhara fatakoona minal mu`azzabeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम ख़ुदा के साथ किसी दूसरे माबूद की इबादत न करो वरना तुम भी मुबतिलाए अज़ाब किए जाओगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَدْعُ – पुकारना, उपासना करना
  • إِلَٰهًا آخَرَ – कोई और पूज्य (माबूद)
  • الْمُعَذَّبِينَ – अज़ाब (यातना) पाने वालों में से

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत नबी करीम ﷺ को संबोधित करते हुए एक बहुत ही स्पष्ट और सख्त चेतावनी देती है—और इसके माध्यम से पूरी उम्मत को भी यही पैग़ाम दिया गया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "तू अल्लाह के साथ किसी और को न पुकार, न उसकी उपासना कर, और न ही उसके साथ किसी को साझी ठहरा।" यानी दुआ, इबादत, नमाज़, क़ुर्बानी, नज़्र-नियाज़, तवक्कुल, डर और उम्मीद—ये सब के सब केवल और केवल अल्लाह ही के लिए होने चाहिए।

अगर कोई व्यक्ति अल्लाह के साथ किसी और को भी पुकारता है या उससे मदद माँगता है—चाहे वह कोई नबी हो, वली हो, फ़रिश्ता हो या कोई और मख़लूक़—तो यह शिर्क है, और शिर्क सबसे बड़ा ज़ुल्म और सबसे बड़ा गुनाह है। अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमाया कि ऐसा करने वाला अज़ाब का हक़दार बनेगा।

यहाँ एक और नुक्ता समझना ज़रूरी है—यह ख़िताब भले ही नबी ﷺ को है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नबी ﷺ से ऐसा होने का डर था, बल्कि यह एक उम्मत के लिए सबक़ है कि अगर अल्लाह के सबसे प्यारे और सबसे आज़िज़ बंदे को भी यह बता दिया जाए कि शिर्क की सूरत में अज़ाब होगा, तो हम जैसे आम लोगों को कितना अधिक डरना चाहिए और कितनी सावधानी बरतनी चाहिए!

यह आयत हमें तौहीद (एकेश्वरवाद) की तरफ़ बुलाती है—वही तौहीद जो हर नबी की पहली पुकार थी। अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना न केवल अक़्ल के ख़िलाफ़ है, बल्कि फ़ितरत के भी ख़िलाफ़ है। जब इंसान सिर्फ़ अल्लाह से जुड़ता है, तो उसका दिल सुकून पाता है, उसकी मुश्किलें आसान होती हैं, और उसे एक ऐसी ताक़त मिलती है जो किसी और से नहीं मिल सकती।

इसलिए इस आयत का पैग़ाम हमारे लिए यह है कि हम अपनी ज़िंदगी के हर मोड़ पर—खुशी में, ग़म में, मुसीबत में, आसानी में—सिर्फ़ अल्लाह को पुकारें, सिर्फ़ उसी से मदद माँगें, और उसी के आगे सिर झुकाएँ। यही वह रास्ता है जो हमें अज़ाब से बचाता है और जन्नत की तरफ़ ले जाता है। अल्लाह हमें शिर्क से बचाए और ख़ालिस मुसलमान बनाकर रखे। आमीन।



📜 आयत 211-215 — अश-शुआरा

211وَمَا يَنبَغِي لَهُمْ وَمَا يَسْتَطِيعُونَ
और ये काम न तो उनके लिए मुनासिब था और न वह कर सकते थे
212إِنَّهُمْ عَنِ السَّمْعِ لَمَعْزُولُونَ
बल्कि वह तो (वही के) सुनने से महरुम हैं
213فَلَا تَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتَكُونَ مِنَ الْمُعَذَّبِينَ
(ऐ रसूल) तुम ख़ुदा के साथ किसी दूसरे माबूद की इबादत न करो वरना तुम भी मुबतिलाए अज़ाब किए जाओगे
214وَأَنذِرْ عَشِيرَتَكَ الْأَقْرَبِينَ
और (ऐ रसूल) तुम अपने क़रीबी रिश्तेदारों को (अज़ाबे ख़ुदा से) डराओ
215وَاخْفِضْ جَنَاحَكَ لِمَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
और जो मोमिनीन तुम्हारे पैरो हो गए हैं उनके सामने अपना बाजू झुकाओ
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अनुवाद — अश-शुआरा 213

सूरा अश-शुआरा आयत 213 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) तुम ख़ुदा के साथ किसी दूसरे माबूद की…

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Tuesday, August 18, 2026

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