अन-नमल · 46/93
अनुवाद उच्चारण — अन-नमल
قَالَ يَا قَوْمِ لِمَ تَسْتَعْجِلُونَ بِالسَّيِّئَةِ قَبْلَ الْحَسَنَةِ ۖ لَوْلَا تَسْتَغْفِرُونَ اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ۝٤٦
Qaala yaa qawmi lima tasta`jiloona bissaiyi`ati qablal hasanati law laa tas taghfiroonal laaha la`allakum turhamoon
📖 हिंदी अर्थ
सालेह ने कहा ऐ मेरी क़ौम (आख़िर) तुम लोग भलाई से पहल बुराई के वास्ते जल्दी क्यों कर रहे हो तुम लोग ख़ुदा की बारगाह में तौबा व अस्तग़फार क्यों नही करते ताकि तुम पर रहम किया जाए
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَسْتَعْجِلُونَ بِالسَّيِّئَةِ – तुम बुराई (अज़ाब) की जल्दी कर रहे हो।
  • الْحَسَنَةِ – भलाई (तौबा और ईमान)।
  • لَوْلَا – क्यों नहीं? (अर्थात् तुम्हें चाहिए था कि…)
  • تَسْتَغْفِرُونَ اللَّهَ – अल्लाह से क्षमा माँगते।
  • لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ – ताकि तुम पर रहम किया जाए।

तफ़सीर:

हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम के काफ़िर लोगों से कहा: "ऐ मेरी क़ौम! तुम अज़ाब की जल्दी क्यों मचा रहे हो? तुम उस बुराई (यानी अल्लाह के अज़ाब) को भलाई (यानी ईमान और तौबा) से पहले क्यों बुला रहे हो? तुम्हें तो चाहिए था कि अल्लाह से क्षमा माँगते और अपने कुफ़्र से तौबा करते, ताकि अल्लाह तुम पर रहम फ़रमाता और तुम्हें अज़ाब से बचा लेता।"

दरअसल, उन लोगों की नासमझी यह थी कि वे कहते थे कि अगर अज़ाब आएगा तो हम तौबा कर लेंगे। वे यह समझते थे कि अज़ाब आने के बाद भी तौबा क़बूल हो जाएगी। हज़रत सालेह ने उन्हें समझाया कि यह सोच बिल्कुल ग़लत है। जब अल्लाह का अज़ाब आ जाता है, तो फिर तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाता है। इसलिए अज़ाब आने से पहले ही अल्लाह से माफ़ी माँग लो, क्योंकि अल्लाह की रहमत उन्हीं के लिए है जो उसकी ओर लौटते हैं और उससे क्षमा की दरख़्वास्त करते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को हमेशा अल्लाह की रहमत की तरफ़ भागना चाहिए, न कि उसके अज़ाब की तरफ़। अल्लाह बहुत मेहरबान और क्षमाशील है। वह चाहता है कि उसके बंदे उसकी ओर रुजू करें, तौबा करें और उसकी रहमत के हक़दार बनें। जो लोग अल्लाह की रहमत से निराश होते हैं, वही अज़ाब की जल्दी करते हैं। हमें चाहिए कि हम हर पल अल्लाह से माफ़ी माँगते रहें, क्योंकि हमें नहीं पता कि हमारी मौत कब आ जाए। अल्लाह की रहमत उन लोगों के लिए है जो उसकी ओर लौटते हैं, और अल्लाह तौबा करने वालों से बहुत प्यार करता है।

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📜 आयत 44-48 — अन-नमल

44قِيلَ لَهَا ادْخُلِي الصَّرْحَ ۖ فَلَمَّا رَأَتْهُ حَسِبَتْهُ لُجَّةً وَكَشَفَتْ عَن سَاقَيْهَا ۚ قَالَ إِنَّهُ صَرْحٌ مُّمَرَّدٌ مِّن قَوَارِيرَ ۗ قَالَتْ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي وَأَسْلَمْتُ مَعَ سُلَيْمَانَ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
फिर उससे कहा गया कि आप अब महल मे चलिए तो जब उसने महल (में शीशे के फर्श) को देखा तो उसको गहरा पानी समझी (और गुज़रने के लिए इस तरह अपने पाएचे उठा लिए कि) अपनी दोनों पिन्डलियाँ खोल दी सुलेमान ने कहा (तुम डरो नहीं) ये (पानी नहीं है) महल है जो शीशे से मढ़ा हुआ है (उस वक्त तम्बीह हुई और) अर्ज़ की परवरदिगार मैने (आफताब को पूजा कर) यक़ीनन अपने ऊपर ज़ुल्म किया
45وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا إِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ فَإِذَا هُمْ فَرِيقَانِ يَخْتَصِمُونَ
और अब मैं सुलेमान के साथ सारे जहाँ के पालने वाले खुदा पर ईमान लाती हूँ और हम ही ने क़ौम समूद के पास उनके भाई सालेह को पैग़म्बर बनाकर भेजा कि तुम लोग ख़ुदा की इबादत करो तो वह सालेह के आते ही (मोमिन व काफिर) दो फरीक़ बनकर बाहम झगड़ने लगे
46قَالَ يَا قَوْمِ لِمَ تَسْتَعْجِلُونَ بِالسَّيِّئَةِ قَبْلَ الْحَسَنَةِ ۖ لَوْلَا تَسْتَغْفِرُونَ اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
सालेह ने कहा ऐ मेरी क़ौम (आख़िर) तुम लोग भलाई से पहल बुराई के वास्ते जल्दी क्यों कर रहे हो तुम लोग ख़ुदा की बारगाह में तौबा व अस्तग़फार क्यों नही करते ताकि तुम पर रहम किया जाए
47قَالُوا اطَّيَّرْنَا بِكَ وَبِمَن مَّعَكَ ۚ قَالَ طَائِرُكُمْ عِندَ اللَّهِ ۖ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ تُفْتَنُونَ
वह लोग बोले हमने तो तुम से और तुम्हारे साथियों से बुरा शगुन पाया सालेह ने कहा तुम्हारी बदकिस्मती ख़ुदा के पास है (ये सब कुछ नहीं) बल्कि तुम लोगों की आज़माइश की जा रही है
48وَكَانَ فِي الْمَدِينَةِ تِسْعَةُ رَهْطٍ يُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ
और शहर में नौ आदमी थे जो मुल्क के बानीये फसाद थे और इसलाह की फिक्र न करते थे-उन लोगों ने (आपस में) कहा कि बाहम ख़ुदा की क़सम खाते जाओ
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अनुवाद — अन-नमल 46

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Tuesday, August 18, 2026

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