अल-क़सस · 33/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
قَالَ رَبِّ إِنِّي قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًا فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ ۝٣٣
Qaala Rabbi innee qataltu minhum nafsan fa akhaafu ai yaqtuloon
📖 हिंदी अर्थ
मूसा ने अर्ज़ की परवरदिगार मैने उनमें से एक शख्स को मार डाला था तो मै डरता हूँ कहीं (उसके बदले) मुझे न मार डालें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • नफ़्सन (نَفْسًا): एक व्यक्ति, एक प्राणी।
  • अख़ाफ़ (أَخَافُ): मैं डरता हूँ।
  • यक़्तुलून (يَقْتُلُونِ): वे मुझे मार डालेंगे।

तफ़सीर:

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब से निवेदन किया: "ऐ मेरे पालनहार! मैंने उन (क़ौमे फ़िरऔन) में से एक व्यक्ति को मार डाला है (वह क़िब्ती था जो एक बनी इस्राईल के आदमी पर ज़ुल्म कर रहा था, और मैंने उसे बचाने के लिए उस क़िब्ती को मुक्का मारा जिससे उसकी मौत हो गई)। अब मुझे डर है कि अगर मैं उनके पास जाऊँगा और उन्हें तेरा पैग़ाम सुनाऊँगा, तो वे मुझे उसी के बदले में क़त्ल कर देंगे।"

यह डर स्वाभाविक था, क्योंकि फ़िरऔन और उसकी क़ौम अत्याचारी और क्रूर थी, और उन्होंने पहले भी बनी इस्राईल के बेटों को क़त्ल करने का हुक्म दे रखा था। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने यह बात अपने रब के सामने रखी, न कि इसलिए कि वे पैग़ाम पहुँचाने से पीछे हटना चाहते थे, बल्कि वे अपनी कमज़ोरी और डर को ख़ुदा के सामने ज़ाहिर कर रहे थे ताकि अल्लाह उन्हें मज़बूती और सहारा दे, और उनके साथ उनके भाई हारून (अलैहिस्सलाम) को भी भेजे जो उनके सहायक हों।

यह हमारे लिए एक बड़ा सबक़ है कि जब हम किसी नेक काम की शुरुआत करें और हमें अपनी क्षमता या हालात का डर हो, तो हमें अल्लाह ही से मदद माँगनी चाहिए। अल्लाह अपने बंदों की कमज़ोरी को जानता है और जब बंदा सच्चे दिल से उसकी ओर रुजू करता है, तो अल्लाह उसे रास्ता दिखाता है और उसके हालात आसान कर देता है। मूसा (अलैहिस्सलाम) की यह दुआ हमें सिखाती है कि अल्लाह से बात करने में कोई शर्म नहीं, बल्कि यही इबादत और भरोसे की निशानी है। अल्लाह ने उनकी यह दुआ क़ुबूल की और उन्हें हारून (अलैहिस्सलाम) का साथ अता किया, और उन्हें फ़िरऔन के सामने जाने का हौसला दिया। यह अल्लाह की रहमत है कि वह अपने नबियों और नेक बंदों की मदद करता है, और हमें भी चाहिए कि हर मुश्किल में अल्लाह से ही मदद माँगें और उसी पर भरोसा रखें।

🎧 सुनें

📜 आयत 31-35 — अल-क़सस

31وَأَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَلَمَّا رَآهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَانٌّ وَلَّىٰ مُدْبِرًا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَا مُوسَىٰ أَقْبِلْ وَلَا تَخَفْ ۖ إِنَّكَ مِنَ الْآمِنِينَ
और यह (भी आवाज़ आयी) कि तुम आपनी छड़ी (ज़मीन पर) डाल दो फिर जब (डाल दिया तो) देखा कि वह इस तरह बल खा रही है कि गोया वह (ज़िन्दा) अजदहा है तो पीठ फेरके भागे और पीछे मुड़कर भी न देखा (तो हमने फरमाया) ऐ मूसा आगे आओ और डरो नहीं तुम पर हर तरह अमन व अमान में हो
32اسْلُكْ يَدَكَ فِي جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَاءَ مِنْ غَيْرِ سُوءٍ وَاضْمُمْ إِلَيْكَ جَنَاحَكَ مِنَ الرَّهْبِ ۖ فَذَانِكَ بُرْهَانَانِ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ
(अच्छा और लो) अपना हाथ गरेबान में डालो (और निकाल लो) तो सफेद बुर्राक़ होकर बेऐब निकल आया और ख़ौफ की (वजह) से अपने बाजू अपनी तरफ समेट लो (ताकि ख़ौफ जाता रहे) ग़रज़ ये दोनों (असा व यदे बैज़ा) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (तुम्हारी नुबूवत की) दो दलीलें फिरऔन और उसके दरबार के सरदारों के वास्ते हैं और इसमें शक नहीं कि वह बदकार लोग थे
33قَالَ رَبِّ إِنِّي قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًا فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ
मूसा ने अर्ज़ की परवरदिगार मैने उनमें से एक शख्स को मार डाला था तो मै डरता हूँ कहीं (उसके बदले) मुझे न मार डालें
34وَأَخِي هَارُونُ هُوَ أَفْصَحُ مِنِّي لِسَانًا فَأَرْسِلْهُ مَعِيَ رِدْءًا يُصَدِّقُنِي ۖ إِنِّي أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ
और मेरा भाई हारुन वह मुझसे (ज़बान में ज्यादा) फ़सीह है तो तू उसे मेरे साथ मेरा मददगार बनाकर भेज कि वह मेरी तसदीक करे क्योंकि यक़ीनन मै इस बात से डरता हूँ कि मुझे वह लोग झुठला देंगे (तो उनके जवाब के लिए गोयाइ की ज़रुरत है)
35قَالَ سَنَشُدُّ عَضُدَكَ بِأَخِيكَ وَنَجْعَلُ لَكُمَا سُلْطَانًا فَلَا يَصِلُونَ إِلَيْكُمَا ۚ بِآيَاتِنَا أَنتُمَا وَمَنِ اتَّبَعَكُمَا الْغَالِبُونَ
फ़रमाया अच्छा हम अनक़रीब तुम्हारे भाई की वजह से तुम्हारे बाज़ू क़वी कर देगें और तुम दोनों को ऐसा ग़लबा अता करेंगें कि फिरऔनी लोग तुम दोनों तक हमारे मौजिज़े की वजह से पहुँच भी न सकेंगे लो जाओ तुम दोनो और तुम्हारे पैरवी करने वाले गालिब रहेंगे
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अनुवाद — अल-क़सस 33

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Tuesday, August 18, 2026

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