अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- नफ़्सन (نَفْسًا): एक व्यक्ति, एक प्राणी।
- अख़ाफ़ (أَخَافُ): मैं डरता हूँ।
- यक़्तुलून (يَقْتُلُونِ): वे मुझे मार डालेंगे।
तफ़सीर:
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब से निवेदन किया: "ऐ मेरे पालनहार! मैंने उन (क़ौमे फ़िरऔन) में से एक व्यक्ति को मार डाला है (वह क़िब्ती था जो एक बनी इस्राईल के आदमी पर ज़ुल्म कर रहा था, और मैंने उसे बचाने के लिए उस क़िब्ती को मुक्का मारा जिससे उसकी मौत हो गई)। अब मुझे डर है कि अगर मैं उनके पास जाऊँगा और उन्हें तेरा पैग़ाम सुनाऊँगा, तो वे मुझे उसी के बदले में क़त्ल कर देंगे।"
यह डर स्वाभाविक था, क्योंकि फ़िरऔन और उसकी क़ौम अत्याचारी और क्रूर थी, और उन्होंने पहले भी बनी इस्राईल के बेटों को क़त्ल करने का हुक्म दे रखा था। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने यह बात अपने रब के सामने रखी, न कि इसलिए कि वे पैग़ाम पहुँचाने से पीछे हटना चाहते थे, बल्कि वे अपनी कमज़ोरी और डर को ख़ुदा के सामने ज़ाहिर कर रहे थे ताकि अल्लाह उन्हें मज़बूती और सहारा दे, और उनके साथ उनके भाई हारून (अलैहिस्सलाम) को भी भेजे जो उनके सहायक हों।
यह हमारे लिए एक बड़ा सबक़ है कि जब हम किसी नेक काम की शुरुआत करें और हमें अपनी क्षमता या हालात का डर हो, तो हमें अल्लाह ही से मदद माँगनी चाहिए। अल्लाह अपने बंदों की कमज़ोरी को जानता है और जब बंदा सच्चे दिल से उसकी ओर रुजू करता है, तो अल्लाह उसे रास्ता दिखाता है और उसके हालात आसान कर देता है। मूसा (अलैहिस्सलाम) की यह दुआ हमें सिखाती है कि अल्लाह से बात करने में कोई शर्म नहीं, बल्कि यही इबादत और भरोसे की निशानी है। अल्लाह ने उनकी यह दुआ क़ुबूल की और उन्हें हारून (अलैहिस्सलाम) का साथ अता किया, और उन्हें फ़िरऔन के सामने जाने का हौसला दिया। यह अल्लाह की रहमत है कि वह अपने नबियों और नेक बंदों की मदद करता है, और हमें भी चाहिए कि हर मुश्किल में अल्लाह से ही मदद माँगें और उसी पर भरोसा रखें।
📜 आयत 31-35 — अल-क़सस
अनुवाद — अल-क़सस 33
सूरा अल-क़सस आयत 33 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मूसा ने अर्ज़ की परवरदिगार मैने उनमें से एक शख्स…सूरा आयत 33/88 — अल-क़सस القصص (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़सस सुनें, अल-क़सस अनुवाद, अल-क़सस mp3, अल-क़सस pdf. आयत 31–35. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए








