अल-अंकबूत · 62/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
اللَّهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ لَهُ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ ۝٦٢
Allaahu yabsutur rizqa limany yashaaa`u min `ibaadihee wa yaqdiru lah; innal laaha bikulli shai`in Aleem
📖 हिंदी अर्थ
ख़ुदा ही अपने बन्दों में से जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है इसमें शक नहीं कि ख़ुदा ही हर चीज़ से वाक़िफ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • यब्सुतु: फैलाना, विस्तार करना, खोल देना।
  • अर-रिज़्क़: रोज़ी, आजीविका, जीविका के साधन।
  • यक़्दिरु: तंग करना, सीमित करना, कम कर देना।
  • अलीम: सब कुछ जानने वाला, पूर्ण ज्ञान रखने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपनी रबूबियत और हिकमत का एक बड़ा नमूना पेश करता है। वह बताता है कि रोज़ी देने वाला केवल अल्लाह ही है। वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, उसे खूब रोज़ी देता है — उसके लिए रोज़ी के दरवाज़े खोल देता है, माल और साधनों में बरकत डालता है। और जिसे चाहता है, उसकी रोज़ी में तंगी कर देता है — उसे कम देता है, या उसके हिस्से को सीमित कर देता है। यह सब उसकी अपनी मर्ज़ी और हिकमत से होता है, न कि किसी के दबाव या किसी की सिफ़ारिश से।

यहाँ एक बहुत ज़रूरी बात यह है कि अल्लाह जिसे रोज़ी देता है, वह इसलिए नहीं कि वह उससे ज़्यादा प्यार करता है, और जिसे कम देता है, वह इसलिए नहीं कि वह उससे नाराज़ है। बल्कि यह सब उसकी गहरी जानकारी और बेहतरीन योजना के अनुसार होता है। अल्लाह हर बंदे की हालत, उसकी ज़रूरत, उसके इम्तिहान और उसकी सलाहियत को पूरी तरह जानता है। वह जानता है कि किसके लिए ज़्यादा रोज़ी बेहतर है और किसके लिए कम रोज़ी ही उसकी भलाई का ज़रिया है। कई बार ज़्यादा रोज़ी इंसान को ग़रूर और नाफ़रमानी में डाल देती है, और कई बार कम रोज़ी उसे अल्लाह की तरफ झुकाती है और उसकी आज़माइश का सबब बनती है।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपनी रोज़ी पर नाज़ नहीं करना चाहिए और न ही कम रोज़ी पर निराश होना चाहिए। अल्लाह जो देता है, उसमें हमारी भलाई होती है। हमें उस पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी तरफ से मिलने वाली हर चीज़ पर शुक्र अदा करना चाहिए। साथ ही, यह भी याद रखें कि अल्लाह हर चीज़ से बाख़बर है — हमारी मेहनत, हमारी दुआएँ, हमारी नीयतें — सब कुछ उसके इल्म में है। इसलिए हमें अपनी रोज़ी बढ़ाने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए, हलाल कमाई की कोशिश करनी चाहिए, और यक़ीन रखना चाहिए कि अल्लाह जो फैसला करता है, वही हमारे लिए बेहतरीन होता है।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि दुनिया में माल और रोज़ी की कमी या ज़्यादती अल्लाह की रज़ा या नाराज़ी का पैमाना नहीं है। बल्कि यह एक इम्तिहान है। जिसे ज़्यादा दिया गया, उसे शुक्र का इम्तिहान दिया गया, और जिसे कम दिया गया, उसे सब्र का इम्तिहान दिया गया। दोनों ही हालात में अल्लाह की रज़ा उसी को मिलती है जो शुक्र और सब्र करता है। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की मुहब्बत और उसकी रहमत के क़रीब ले जाता है।



📜 आयत 60-64 — अल-अंकबूत

60وَكَأَيِّن مِّن دَابَّةٍ لَّا تَحْمِلُ رِزْقَهَا اللَّهُ يَرْزُقُهَا وَإِيَّاكُمْ ۚ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
और ज़मीन पर चलने वालों में बहुतेरे ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी अपने ऊपर लादे नहीं फिरते ख़ुदा ही उनको भी रोज़ी देता है और तुम को भी और वह बड़ा सुनने वाला वाक़िफकार है
61وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
(ऐ रसूल) अगर तुम उनसे पूछो कि (भला) किसने सारे आसमान व ज़मीन को पैदा किया और चाँद और सूरज को काम में लगाया तो वह ज़रुर यही कहेंगे कि अल्लाह ने फिर वह कहाँ बहके चले जाते हैं
62اللَّهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ لَهُ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
ख़ुदा ही अपने बन्दों में से जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है इसमें शक नहीं कि ख़ुदा ही हर चीज़ से वाक़िफ है
63وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّن نَّزَّلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ مِن بَعْدِ مَوْتِهَا لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۚ قُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
और (ऐ रसूल) अगर तुम उससे पूछो कि किसने आसमान से पानी बरसाया फिर उसके ज़रिये से ज़मीन को इसके मरने (परती होने) के बाद ज़िन्दा (आबाद) किया तो वह ज़रुर यही कहेंगे कि अल्लाह ने (ऐ रसूल) तुम कह दो अल्हम दो लिल्लाह-मगर उनमे से बहुतेरे (इतना भी) नहीं समझते
64وَمَا هَٰذِهِ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا لَهْوٌ وَلَعِبٌ ۚ وَإِنَّ الدَّارَ الْآخِرَةَ لَهِيَ الْحَيَوَانُ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ
और ये दुनिया की ज़िन्दगी तो खेल तमाशे के सिवा कुछ नहीं और मगर ये लोग समझें बूझें तो इसमे शक नहीं कि अबदी ज़िन्दगी (की जगह) तो बस आख़ेरत का घर है (बाक़ी लग़ो)
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अनुवाद — अल-अंकबूत 62

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Wednesday, August 19, 2026

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