अल-अंकबूत · 63/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّن نَّزَّلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ مِن بَعْدِ مَوْتِهَا لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۚ قُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ ۝٦٣
Wa la`in sa altahum man nazzala minas samaaa`e maaa`an fa ahyaa bihil arda mim ba`di mawtihaa la yaqoolunnal laah; qulil hamdu lillah; bal aksaruhum laa ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) अगर तुम उससे पूछो कि किसने आसमान से पानी बरसाया फिर उसके ज़रिये से ज़मीन को इसके मरने (परती होने) के बाद ज़िन्दा (आबाद) किया तो वह ज़रुर यही कहेंगे कि अल्लाह ने (ऐ रसूल) तुम कह दो अल्हम दो लिल्लाह-मगर उनमे से बहुतेरे (इतना भी) नहीं समझते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • नज़्ज़ल: उतारा
  • अह्या: जीवित किया, हरा-भरा किया
  • मौतिहा: उसकी मृत्यु के बाद (यानी सूखी और बंजर होने के बाद)

तफ़सीर:

ऐ नबी! अगर आप इन मुशरिकों से पूछें कि आसमान से पानी किसने उतारा, जिससे ज़मीन उसके सूखे और बंजर होने के बाद हरी-भरी और जीवित हो जाती है, तो वे ज़रूर कहेंगे: "अल्लाह ने।" वे इस सच्चाई को मानते हैं और इसका इनकार नहीं कर सकते, क्योंकि यह उनकी फ़ितरत (स्वाभाविक प्रवृत्ति) में बसी हुई बात है।

आप उनसे कहिए: "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है!" — यानी अल्लाह का शुक्र है कि उसने आपके सामने ऐसी स्पष्ट दलील पेश कर दी जिसे आप खुद मानते हो, और आपकी अपनी गवाही ही आपके खिलाफ काफी है।

लेकिन अफसोस! उनमें से अधिकतर लोग अक्ल से काम नहीं लेते। अगर वे सोचते-समझते, तो यह भली-भांति जान लेते कि जो अल्लाह पानी बरसाने और ज़मीन को जीवित करने पर कादिर (सक्षम) है, वही मुर्दों को दोबारा जीवित करने पर भी कादिर है। फिर वे उसी अल्लाह के साथ दूसरों को साझी क्यों बनाते हैं? जिन मूर्तियों को वे पूजते हैं, वे न तो पानी बरसा सकती हैं, न ज़मीन को हरा-भरा कर सकती हैं, न किसी को फायदा पहुंचा सकती हैं और न नुकसान से बचा सकती हैं।

यह कितनी बड़ी नादानी है कि इंसान अपनी आँखों से अल्लाह की कुदरत के नमूने देखता है, अपनी ज़बान से उसकी रुबूबियत का इकरार करता है, लेकिन फिर भी उसके साथ शिर्क करता है। अगर वे अक्ल से काम लेते, तो यह तनाकुज़ (विरोधाभास) उन्हें कभी मंज़ूर न होता।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की कुदरत के नज़ारे हर तरफ बिखरे हुए हैं — बारिश, हरियाली, मौसमों का बदलना — ये सब उसकी रहमत की निशानियाँ हैं। जब हम इन निशानियों पर गौर करते हैं, तो हमारा ईमान मज़बूत होता है और हमारा दिल अल्लाह की मोहब्बत से भर जाता है। यही वह रास्ता है जो इंसान को सच्ची मंज़िल तक पहुंचाता है — अल्लाह की इबादत और उसके साथ किसी को शरीक न करना। आइए, हम उन लोगों में से न बनें जो सच्चाई को जानकर भी उस पर अमल नहीं करते, बल्कि हम उन बंदों में शामिल हों जो अक्ल से काम लेते हैं और अपने रब की इबादत पर कायम रहते हैं।



📜 आयत 61-65 — अल-अंकबूत

61وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
(ऐ रसूल) अगर तुम उनसे पूछो कि (भला) किसने सारे आसमान व ज़मीन को पैदा किया और चाँद और सूरज को काम में लगाया तो वह ज़रुर यही कहेंगे कि अल्लाह ने फिर वह कहाँ बहके चले जाते हैं
62اللَّهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ لَهُ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
ख़ुदा ही अपने बन्दों में से जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है इसमें शक नहीं कि ख़ुदा ही हर चीज़ से वाक़िफ है
63وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّن نَّزَّلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ مِن بَعْدِ مَوْتِهَا لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۚ قُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
और (ऐ रसूल) अगर तुम उससे पूछो कि किसने आसमान से पानी बरसाया फिर उसके ज़रिये से ज़मीन को इसके मरने (परती होने) के बाद ज़िन्दा (आबाद) किया तो वह ज़रुर यही कहेंगे कि अल्लाह ने (ऐ रसूल) तुम कह दो अल्हम दो लिल्लाह-मगर उनमे से बहुतेरे (इतना भी) नहीं समझते
64وَمَا هَٰذِهِ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا لَهْوٌ وَلَعِبٌ ۚ وَإِنَّ الدَّارَ الْآخِرَةَ لَهِيَ الْحَيَوَانُ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ
और ये दुनिया की ज़िन्दगी तो खेल तमाशे के सिवा कुछ नहीं और मगर ये लोग समझें बूझें तो इसमे शक नहीं कि अबदी ज़िन्दगी (की जगह) तो बस आख़ेरत का घर है (बाक़ी लग़ो)
65فَإِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ
फिर जब ये लोग कश्ती में सवार होते हैं तो निहायत ख़ुलूस से उसकी इबादत करने वाले बन कर ख़ुदा से दुआ करते हैं फिर जब उन्हें ख़ुश्की में (पहुँचा कर) नजात देता है तो फौरन शिर्क करने लगते हैं
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अनुवाद — अल-अंकबूत 63

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Tuesday, August 18, 2026

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