बेशक ख़ुदा पर कोई चीज़ पोशीदा नहीं है (न) ज़मीन में न आसमान में
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
لَا يَخْفَىٰ عَلَيْهِ: उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है, न वह उससे ओझल होती है।
شَيْءٌ: कोई वस्तु, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, सूक्ष्म हो या स्थूल।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत अल्लाह तआला के उस ज्ञान का वर्णन करती है जो हर चीज़ को घेरे हुए है। अल्लाह का इल्म (ज्ञान) ऐसा है कि उससे धरती में और आसमानों में कोई भी चीज़ छिपी नहीं है—चाहे वह पहाड़ों की तलहटी में हो, समुद्रों की गहराइयों में, अंधेरी रातों में या सीने के भेदों में। उसका ज्ञान हर चीज़ के ज़ाहिर (बाहरी) और बातिन (आंतरिक) पहलुओं को समेटे हुए है। आसमान और ज़मीन का ज़िक्र इसलिए किया गया क्योंकि ये दोनों सारी मख़लूक़ात (सृष्टि) का घर हैं—जो कुछ भी इनमें है, वह अल्लाह के इल्म से बाहर नहीं है। यहाँ तक कि एक पत्ते का गिरना, एक बीज का अंकुरित होना, एक क़तरे का बनना—सब कुछ उसके नियंत्रण और ज्ञान में है। यह आयत अल्लाह की अज़मत (महानता) और उसकी हर चीज़ पर पूर्ण निगरानी को स्पष्ट करती है।
फ़ायदे (सबक):
अल्लाह की निगरानी का एहसास: जब इंसान को यक़ीन हो जाए कि अल्लाह उसके हर अमल, हर ख़याल और हर नीयत को जानता है, तो वह गुनाहों से बचता है और नेकी पर क़ायम रहता है। यह उसके लिए सबसे बड़ा अदब (अनुशासन) और परहेज़गारी का ज़रिया है।
अल्लाह पर भरोसा: जब हम जानते हैं कि अल्लाह को हमारी हर मुश्किल, हर दर्द और हर ज़रूरत का इल्म है, तो हम उसी से मदद माँगते हैं और उसी पर तवक्कुल (भरोसा) करते हैं। यह दिल को सुकून देता है।
इबादत में ख़ुशू (एकाग्रता): यह अहसास कि अल्लाह हमारी इबादत देख रहा है और हमारी दुआ सुन रहा है, इबादत में गहराई और लज़्ज़त पैदा करता है।
इंसाफ़ और अदल: यह आयत इंसान को सिखाती है कि जिस तरह अल्लाह हर चीज़ से बाख़बर है, उसी तरह हमें भी अपने मामलों में दूसरों के साथ इंसाफ़ करना चाहिए, क्योंकि हमारा रब हमारे हर फ़ैसले को देख रहा है।
अल्लाह की अज़मत का तसव्वुर: यह आयत हमें अल्लाह की उस सिफ़त (गुण) पर ग़ौर करने की दावत देती है जो उसे हर कमी और हर अज्ञानता से पाक करती है—वह सब कुछ जानने वाला है, और यही उसकी इबादत का हक़ है।
(ऐ रसूल) उसी ने तुम पर बरहक़ किताब नाज़िल की जो (आसमानी किताबें पहले से) उसके सामने मौजूद हैं उनकी तसदीक़ करती है और उसी ने उससे पहले लोगों की हिदायत के वास्ते तौरेत व इन्जील नाज़िल की
और हक़ व बातिल में तमीज़ देने वाली किताब (कुरान) नाज़िल की बेशक जिन लोगों ने ख़ुदा की आयतों को न माना उनके लिए सख्त अज़ाब है और ख़ुदा हर चीज़ पर ग़ालिब बदला लेने वाला है
वही (हर चीज़ पर) ग़ालिब और दाना है (ए रसूल) वही (वह ख़ुदा) है जिसने तुमपर किताब नाज़िल की उसमें की बाज़ आयतें तो मोहकम (बहुत सरीह) हैं वही (अमल करने के लिए) असल (व बुनियाद) किताब है और कुछ (आयतें) मुतशाबेह (मिलती जुलती) (गोल गोल जिसके मायने में से पहलू निकल सकते हैं) पस जिन लोगों के दिलों में कज़ी है वह उन्हीं आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जो मुतशाबेह हैं ताकि फ़साद बरपा करें और इस ख्याल से कि उन्हें मतलब पर ढाले लें हालाँकि ख़ुदा और उन लोगों के सिवा जो इल्म से बड़े पाए पर फ़ायज़ हैं उनका असली मतलब कोई नहीं जानता वह लोग (ये भी) कहते हैं कि हम उस पर ईमान लाए (यह) सब (मोहकम हो या मुतशाबेह) हमारे परवरदिगार की तरफ़ से है और अक्ल वाले ही समझते हैं
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