अर-रूम · 13/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
وَلَمْ يَكُن لَّهُم مِّن شُرَكَائِهِمْ شُفَعَاءُ وَكَانُوا بِشُرَكَائِهِمْ كَافِرِينَ ۝١٣
Wa lam yakul lahum min shurakaaa`ihim shufa`aaa`u wa kaanoo bishurakaaa`ihim kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
और उनके (बनाए हुए ख़ुदा के) शरीकों में से कोई उनका सिफारिशी न होगा और ये लोग ख़़ुद भी अपने शरीकों से इन्कार कर जाएँगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • شُرَكَائِهِمْ — उनके साझीदार (जिन्हें वे दुनिया में ईश्वर का भागीदार मानकर पूजते थे)
  • شُفَعَاءُ — सिफ़ारिश करने वाले, मध्यस्थ
  • كَافِرِينَ — इनकार करने वाले, अस्वीकार करने वाले (यहाँ अर्थ: उनसे बैर रखने वाले और उन्हें छोड़ देने वाले)

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस भयानक दिन (क़ियामत) की स्थिति का वर्णन कर रही है जब मुशरिक (ईश्वर का साझीदार ठहराने वाले) लोग अपने उन देवी-देवताओं और माबूदों की ओर आशा भरी निगाहों से देखेंगे, जिन्हें उन्होंने दुनिया में अल्लाह के सिवा पूजा था। वे सोचेंगे कि शायद ये उनकी सिफ़ारिश करके उन्हें अज़ाब से बचा लेंगे। लेकिन उस दिन उनकी यह उम्मीद पूरी तरह निराशा में बदल जाएगी, क्योंकि उनके वे साझीदार न तो उनकी सिफ़ारिश कर सकेंगे और न ही उन्हें कोई मदद पहुँचा सकेंगे।

इससे भी बढ़कर दर्दनाक बात यह है कि जिन्हें वे अपना सहारा समझते थे, वही उनसे बैर कर लेंगे और उन्हें अस्वीकार कर देंगे। वे दोनों एक-दूसरे से बराअत (अलगाव) का ऐलान करेंगे — पूजने वाले पूजे जाने वालों से और पूजे जाने वाले पूजने वालों से। हर एक दूसरे को छोड़कर भागेगा और दूसरे पर लानत भेजेगा। यह उस धोखे का सबसे बड़ा खुलासा होगा जो दुनिया में शिर्क (ईश्वर के साथ साझीदार ठहराने) के रूप में उन्हें मिला था।

इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सिफ़ारिश और मध्यस्थता का अधिकार केवल अल्लाह के पास है, और वह भी केवल उसी की अनुमति से होगी। जो लोग अल्लाह के सिवा किसी और से मदद, नजात (मुक्ति) या सिफ़ारिश की उम्मीद रखते हैं, वे क़ियामत के दिन बुरी तरह निराश होंगे। अतः बुद्धिमान वही है जो इसी दुनिया में अपने रिश्ते को केवल अल्लाह से जोड़ ले, उसकी इबादत करे और उसी से मदद माँगे। यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है, और यही वह रास्ता है जो हमें उस दिन की शर्मिंदगी और निराशा से बचा सकता है।

आइए हम अपने दिलों को शिर्क की हर रूप से पाक करें और केवल अल्लाह पर भरोसा रखें, क्योंकि वही है जो सुनता है, देखता है और अपने बंदों की मदद करता है। उसकी रहमत और माफ़ी की कोई सीमा नहीं है, बशर्ते हम सच्चे दिल से उसकी ओर लौट आएँ।



📜 आयत 11-15 — अर-रूम

11اللَّهُ يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
ख़ुदा ही ने मख़लूकात को पहली बार पैदा किया फिर वही दुबारा (पैदा करेगा) फिर तुम सब लोग उसी की तरफ लौटाए जाओगे
12وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُبْلِسُ الْمُجْرِمُونَ
और जिस दिन क़यामत बरपा होगी (उस दिन) गुनेहगार लोग ना उम्मीद होकर रह जाएँगे
13وَلَمْ يَكُن لَّهُم مِّن شُرَكَائِهِمْ شُفَعَاءُ وَكَانُوا بِشُرَكَائِهِمْ كَافِرِينَ
और उनके (बनाए हुए ख़ुदा के) शरीकों में से कोई उनका सिफारिशी न होगा और ये लोग ख़़ुद भी अपने शरीकों से इन्कार कर जाएँगे
14وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يَوْمَئِذٍ يَتَفَرَّقُونَ
और जिस दिन क़यामत बरपा होगी उस दिन (मोमिनों से) कुफ्फ़ार जुदा हो जाएँगें
15فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَهُمْ فِي رَوْضَةٍ يُحْبَرُونَ
फिर जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए तो वह बाग़े बेहश्त में निहाल कर दिए जाएँगे
अर-रूमकुरान सूची
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13आयत

अनुवाद — अर-रूम 13

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Tuesday, August 18, 2026

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