यासीन · 20/83
अनुवाद उच्चारण — सूरा यासीन
وَجَاءَ مِنْ أَقْصَى الْمَدِينَةِ رَجُلٌ يَسْعَىٰ قَالَ يَا قَوْمِ اتَّبِعُوا الْمُرْسَلِينَ ۝٢٠
Wa jaaa`a min aqsal madeenati rajuluny yas`aa qaala yaa qawmit tabi`ul mursaleen
📖 हिंदी अर्थ
और (इतने में) शहर के उस सिरे से एक शख्स (हबीब नज्जार) दौड़ता हुआ आया और कहने लगा कि ऐ मेरी क़ौम (इन) पैग़म्बरों का कहना मानो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَقْصَى الْمَدِينَةِ: शहर के सबसे दूर के हिस्से से।
  • يَسْعَى: तेज़ी से दौड़ता हुआ, जल्दी करता हुआ।
  • اتَّبِعُوا: पैरवी करो, अनुसरण करो।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब उस बस्ती के लोगों ने अल्लाह के भेजे हुए रसूलों को झुठलाने का फैसला किया और उन्हें सताने व मारने की धमकी दी, तो उसी शहर के सबसे दूर के इलाके से एक सच्चा इंसान दौड़ता हुआ आया। यह वही हबीब नज्जार था, जो पहले से ही रसूलों पर ईमान ला चुका था। उसका दिल अपनी क़ौम के अंजाम से डरा हुआ था, और वह चाहता था कि किसी तरह उन्हें इस हलाकत से बचा ले।

उसने अपनी क़ौम से कहा: "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इन रसूलों की पैरवी करो, इनके पीछे चलो।" वह जानता था कि ये रसूल सच्चे हैं, और उसकी यह पुकार सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए थी। वह चाहता था कि उसकी क़ौम उस रास्ते पर चले जो उनकी भलाई और नजात का ज़रिया है।

इस आयत में हमें एक बहुत बड़ा सबक मिलता है — कि एक इंसान भी अगर सच्चाई पर हो और उसे अपनी क़ौम की भलाई की फिक्र हो, तो वह अकेले ही सच्चाई की आवाज़ बुलंद कर सकता है। हबीब नज्जार ने डर और खतरे की परवाह नहीं की, वह दौड़ता हुआ आया और अपनी क़ौम को सीधे रास्ते की दावत दी। यही वह जज़्बा है जो हर मुसलमान में होना चाहिए — भलाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना, चाहे हालात कैसे भी हों।

अल्लाह तआला ने इस क़िस्से को कुरआन में हमेशा के लिए महफूज़ कर दिया, ताकि हम सीखें कि सच्चाई की खातिर जान देने वालों का अज्र अल्लाह के पास बहुत बड़ा है। और यह भी कि रसूलों की पैरवी ही वह रास्ता है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुंचाता है।



📜 आयत 18-22 — सूरा यासीन

18قَالُوا إِنَّا تَطَيَّرْنَا بِكُمْ ۖ لَئِن لَّمْ تَنتَهُوا لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَلَيَمَسَّنَّكُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌ
वह बोले हमने तुम लोगों को बहुत नहस क़दम पाया कि (तुम्हारे आते ही क़हत में मुबतेला हुए) तो अगर तुम (अपनी बातों से) बाज़ न आओगे तो हम लोग तुम्हें ज़रूर संगसार कर देगें और तुमको यक़ीनी हमारा दर्दनाक अज़ाब पहुँचेगा
19قَالُوا طَائِرُكُم مَّعَكُمْ ۚ أَئِن ذُكِّرْتُم ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ مُّسْرِفُونَ
पैग़म्बरों ने कहा कि तुम्हारी बद शुगूनी (तुम्हारी करनी से) तुम्हारे साथ है क्या जब नसीहत की जाती है (तो तुम उसे बदफ़ाली कहते हो नहीं) बल्कि तुम खुद (अपनी) हद से बढ़ गए हो
20وَجَاءَ مِنْ أَقْصَى الْمَدِينَةِ رَجُلٌ يَسْعَىٰ قَالَ يَا قَوْمِ اتَّبِعُوا الْمُرْسَلِينَ
और (इतने में) शहर के उस सिरे से एक शख्स (हबीब नज्जार) दौड़ता हुआ आया और कहने लगा कि ऐ मेरी क़ौम (इन) पैग़म्बरों का कहना मानो
21اتَّبِعُوا مَن لَّا يَسْأَلُكُمْ أَجْرًا وَهُم مُّهْتَدُونَ
ऐसे लोगों का (ज़रूर) कहना मानो जो तुमसे (तबलीख़े रिसालत की) कुछ मज़दूरी नहीं माँगते और वह लोग हिदायत याफ्ता भी हैं
22وَمَا لِيَ لَا أَعْبُدُ الَّذِي فَطَرَنِي وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
और मुझे क्या (ख़ब्त) हुआ है कि जिसने मुझे पैदा किया है उसकी इबादत न करूँ हालाँकि तुम सब के बस (आख़िर) उसी की तरफ लौटकर जाओगे
यासीनकुरान सूची
83आयत
मक्कीअवतरण स्थान
20आयत

अनुवाद — यासीन 20

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Friday, October 2, 2026

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