अस-साफ्फात · 14/182
अनुवाद उच्चारण — अस-साफ्फात
وَإِذَا رَأَوْا آيَةً يَسْتَسْخِرُونَ ۝١٤
Wa izaa ra aw Aayatinw yastaskhiroon
📖 हिंदी अर्थ
और जब किसी मौजिजे क़ो देखते हैं तो (उससे) मसख़रापन करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَةً: निशानी, चमत्कार, वह प्रमाण जो सत्य की गवाही दे।
  • يَسْتَسْخِرُونَ: अत्यधिक मज़ाक उड़ाना, खूब हँसी-ठट्ठा करना, उपहास करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब ये काफ़िर लोग आप (ﷺ) की नबुव्वत की सच्चाई पर दलील देने वाली कोई निशानी या चमत्कार देखते हैं—जैसे चाँद का फटना, पत्थर का बोलना, या कोई और सत्य प्रमाण—तो वे उसे ध्यान से नहीं देखते, न ही उससे सबक़ लेते हैं। बल्कि वे उस पर खूब हँसते हैं, मज़ाक उड़ाते हैं और उसे बेकार ठहराने की कोशिश करते हैं। उनका यह व्यवहार उनकी हठधर्मिता और सत्य से मुँह मोड़ने की आदत को दर्शाता है। वे हर सच्ची निशानी को देखकर अपने दिलों की सख्ती और अहंकार के कारण उसका उपहास करते हैं, जैसे कि सच्चाई उनके लिए मज़ाक की चीज़ हो। यह उनकी नादानी और अंधेपन की सबसे बड़ी निशानी है कि जब स्पष्ट प्रमाण उनके सामने आते हैं, तो वे उन्हें गंभीरता से लेने के बजाय हँसी-मज़ाक में उड़ा देते हैं।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें सीख मिलती है कि सत्य के रास्ते पर चलने वालों को हमेशा मुख़ालिफ़ों के तानों और उपहास का सामना करना पड़ता है। लेकिन एक सच्चे मोमिन का काम यह नहीं कि वह इन बातों से विचलित हो, बल्कि उसे अपने ईमान पर मज़बूती से क़ायम रहना चाहिए। याद रखिए, जब नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को सच्चाई की तरफ़ बुलाया, तो उन्होंने भी उनका मज़ाक उड़ाया। जब मूसा (अलैहिस्सलाम) ने फ़िरऔन के सामने चमत्कार पेश किए, तो उसने उन्हें जादू कहा। और जब हमारे नबी (ﷺ) ने सच्चाई पेश की, तो काफ़िरों ने उन्हें जादूगर और पागल कहा। यह सुन्नतुल्लाह (अल्लाह की परंपरा) है कि सत्य के दुश्मन हमेशा उसका उपहास करते हैं। लेकिन अल्लाह का वादा है कि सच्चाई ही बुलंद होगी और मज़ाक उड़ाने वाले खुद रुसवा होंगे। इसलिए जब आपको किसी सच्ची बात या अल्लाह की निशानी पर लोग हँसें, तो निराश न हों—बल्कि यह समझें कि यही सच्चाई की कसौटी है। अल्लाह उन लोगों के साथ है जो सब्र करते हैं और सत्य पर डटे रहते हैं। आप अपने ईमान को मज़बूत रखें, क्योंकि अल्लाह की मदद उन्हीं के लिए है जो उसके दीन पर साबित-क़दम रहते हैं।



📜 आयत 12-16 — अस-साफ्फात

12بَلْ عَجِبْتَ وَيَسْخَرُونَ
बल्कि तुम (उन कुफ्फ़ार के इन्कार पर) ताज्जुब करते हो और वह लोग (तुमसे) मसख़रापन करते हैं
13وَإِذَا ذُكِّرُوا لَا يَذْكُرُونَ
और जब उन्हें समझाया जाता है तो समझते नहीं हैं
14وَإِذَا رَأَوْا آيَةً يَسْتَسْخِرُونَ
और जब किसी मौजिजे क़ो देखते हैं तो (उससे) मसख़रापन करते हैं
15وَقَالُوا إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ
और कहते हैं कि ये तो बस खुला हुआ जादू है
16أَإِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
भला जब हम मर जाएँगे और ख़ाक और हड्डियाँ रह जाएँगे
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अनुवाद — अस-साफ्फात 14

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Tuesday, August 18, 2026

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