अज़-ज़ुमर · 31/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ عِندَ رَبِّكُمْ تَخْتَصِمُونَ ۝٣١
Summa innakum Yawmal Qiyaamati `inda Rabbikum takhtasimoon
📖 हिंदी अर्थ
और ये लोग भी यक़ीनन मरने वाले हैं फिर तुम लोग क़यामत के दिन अपने परवरदिगार की बारगाह में बाहम झगड़ोगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • तख़्तसिमून (تَخْتَصِمُونَ): एक-दूसरे से झगड़ना, विवाद करना, और अपना-अपना दावा पेश करना। यानी हर इंसान अपने हक़ के लिए दलीलें देगा और दूसरे पर आरोप लगाएगा।

तफ़सीर (व्याख्या):

फिर क़यामत के दिन तुम सब अपने रब के सामने हाज़िर होकर आपस में झगड़ोगे और विवाद करोगे। यानी जो लोग दुनिया में एक-दूसरे पर ज़ुल्म करते थे, हक़ मारते थे, झूठे आरोप लगाते थे, या किसी का हक़ दबाते थे — वे सब उस दिन अपने रब के सामने खड़े होकर एक-दूसरे से झगड़ेंगे। हर ज़ालिम से उसका मज़लूम बदला लेगा, हर झूठे से सच्चा अपना हक़ माँगेगा, और हर मुक़द्दमा अल्लाह के सामने पेश होगा। उस दिन कोई रिश्ता, कोई सिफ़ारिश, कोई दौलत या कोई ताक़त किसी के काम नहीं आएगी। अल्लाह तआला अपने न्याय और इंसाफ़ के साथ हर फ़ैसला करेगा — हक़ वाले को उसका हक़ दिलाएगा और बातिल को रुसवा करेगा। यह वह दिन होगा जब हर इंसान अपने अमल का नतीजा देखेगा, और जो कोई दुनिया में किसी पर ज़ुल्म करके गया होगा, उसे उस दिन पूरा-पूरा बदला चुकाना होगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें बड़ी सीख देती है कि इस दुनिया में अगर कोई ज़ालिम अपने ज़ुल्म से बच निकलता है, और कोई हक़ मारने वाला बेपरवाह घूमता है, तो वह समझे कि अल्लाह की पकड़ से कोई नहीं बच सकता। क़यामत का दिन ज़रूर आने वाला है, और उस दिन हर ज़ुल्म, हर नाइंसाफ़ी, हर दबाया गया हक़ सामने आएगा। यह हमारे लिए इंसाफ़ पर चलने की तरग़ीब है — कि हम किसी का हक़ न मारें, किसी पर ज़ुल्म न करें, और अगर हमसे कोई ग़लती हुई है तो दुनिया में ही माफ़ी माँग लें और हक़ वापस कर दें। क्योंकि उस दिन का हिसाब बहुत सख़्त होगा, और वहाँ सिर्फ़ अल्लाह का फ़ैसला होगा — जो सबसे बड़ा न्यायी और रहम करने वाला है। यह आयत हमें यक़ीन दिलाती है कि अल्लाह का इंसाफ़ कभी ज़ाइए नहीं होता, और यही हमारे दिलों को सुकून देता है कि अगर दुनिया में इंसाफ़ न मिले, तो आख़िरत में ज़रूर मिलेगा।



📜 आयत 29-33 — अज़-ज़ुमर

29ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا رَّجُلًا فِيهِ شُرَكَاءُ مُتَشَاكِسُونَ وَرَجُلًا سَلَمًا لِّرَجُلٍ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
ताकि ये लोग (समझकर) खुदा से डरे ख़ुदा ने एक मिसाल बयान की है कि एक शख्स (ग़ुलाम) है जिसमें कई झगड़ालू साझी हैं और एक ज़ालिम है कि पूरा एक शख्स का है उन दोनों की हालत यकसाँ हो सकती हैं (हरगिज़ नहीं) अल्हमदोलिल्लाह मगर उनमें अक्सर इतना भी नहीं जानते
30إِنَّكَ مَيِّتٌ وَإِنَّهُم مَّيِّتُونَ
(ऐ रसूल) बेशक तुम भी मरने वाले हो
31ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ عِندَ رَبِّكُمْ تَخْتَصِمُونَ
और ये लोग भी यक़ीनन मरने वाले हैं फिर तुम लोग क़यामत के दिन अपने परवरदिगार की बारगाह में बाहम झगड़ोगे
32۞ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَذَبَ عَلَى اللَّهِ وَكَذَّبَ بِالصِّدْقِ إِذْ جَاءَهُ ۚ أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَافِرِينَ
तो इससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो ख़ुदा पर झूठ (तूफान) बाँधे और जब उसके पास सच्ची बात आए तो उसको झुठला दे क्या जहन्नुम में कााफिरों का ठिकाना नहीं है
33وَالَّذِي جَاءَ بِالصِّدْقِ وَصَدَّقَ بِهِ ۙ أُولَٰئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ
(ज़रूर है) और याद रखो कि जो शख्स (रसूल) सच्ची बात लेकर आया वह और जिसने उसकी तसदीक़ की यही लोग तो परहेज़गार हैं
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीRevelation
31आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 31

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Tuesday, August 18, 2026

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