अज़-ज़ुमर · 30/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
إِنَّكَ مَيِّتٌ وَإِنَّهُم مَّيِّتُونَ ۝٣٠
Innaka maiyitunw wa inna hum maiyitunw wa inna hum maiyitoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) बेशक तुम भी मरने वाले हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • मय्यितुन (مَيّتٌ): मृत्यु को प्राप्त होने वाला, मरने वाला। यहाँ इसका अर्थ है कि मृत्यु निश्चित है, चाहे वह अभी न आई हो।

व्याख्या:

ऐ नबी! आप भी मृत्यु को प्राप्त होने वाले हैं, और ये लोग (आपके विरोधी और सभी लोग) भी मरने वाले हैं। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि हर जीवित प्राणी को मृत्यु का स्वाद चखना है। न तो आप हमेशा रहेंगे और न ही ये लोग। मृत्यु किसी को नहीं छोड़ती—न नबी को, न आम इंसान को, न बड़े को, न छोटे को। यह ईश्वर का अटल नियम है।

फिर क़यामत के दिन तुम सब अपने रब के सामने एकत्र होगे और आपस में झगड़ों का फ़ैसला होगा। जो लोग आपको झुठला रहे हैं, आप पर हंस रहे हैं, या आपकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि मृत्यु उन्हें भी आएगी। मृत्यु में किसी के लिए शर्मिंदगी या खुशी नहीं है—यह तो सभी का साझा सफ़र है। असली कामयाबी और नुक़सान तो उस दिन होगा जब हर इंसान अपने अमल के साथ हाज़िर होगा।

दावत और नसीहत:

ऐ इंसान! यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की ज़िंदगी कुछ दिनों की है। जो लोग सत्ता, धन, या ताक़त पर इतराते हैं, वे भी मरेंगे; और जो कमज़ोर और मज़लूम हैं, वे भी मरेंगे। इसलिए बुद्धिमान वही है जो इस छोटी सी ज़िंदगी को उस रब की रज़ा के लिए बिताए जो कभी नहीं मरता। मृत्यु को याद रखना दिल को नरम करता है, ग़ुरूर को मिटाता है, और इंसान को अच्छे कामों की तरफ़ ले जाता है। आप अपने रब से माफ़ी मांगें, अपने आख़िरत के लिए कुछ अच्छा भेजें, क्योंकि वही दिन सच्ची कामयाबी का दिन होगा जब हम अपने अमल के साथ अल्लाह के सामने खड़े होंगे। यह आयत हमें बराबरी का पैग़ाम देती है—मौत के सामने सब एक समान हैं, तो फिर हम एक-दूसरे से बड़ाई क्यों करें? आओ, हम सब अपने रब की तरफ़ लौटें और उसकी रहमत के तलबगार बनें।



📜 आयत 28-32 — अज़-ज़ुमर

28قُرْآنًا عَرَبِيًّا غَيْرَ ذِي عِوَجٍ لَّعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
(हम ने तो साफ और सलीस) एक अरबी कुरान (नाज़िल किया) जिसमें ज़रा भी कजी (पेचीदगी) नहीं
29ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا رَّجُلًا فِيهِ شُرَكَاءُ مُتَشَاكِسُونَ وَرَجُلًا سَلَمًا لِّرَجُلٍ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
ताकि ये लोग (समझकर) खुदा से डरे ख़ुदा ने एक मिसाल बयान की है कि एक शख्स (ग़ुलाम) है जिसमें कई झगड़ालू साझी हैं और एक ज़ालिम है कि पूरा एक शख्स का है उन दोनों की हालत यकसाँ हो सकती हैं (हरगिज़ नहीं) अल्हमदोलिल्लाह मगर उनमें अक्सर इतना भी नहीं जानते
30إِنَّكَ مَيِّتٌ وَإِنَّهُم مَّيِّتُونَ
(ऐ रसूल) बेशक तुम भी मरने वाले हो
31ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ عِندَ رَبِّكُمْ تَخْتَصِمُونَ
और ये लोग भी यक़ीनन मरने वाले हैं फिर तुम लोग क़यामत के दिन अपने परवरदिगार की बारगाह में बाहम झगड़ोगे
32۞ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَذَبَ عَلَى اللَّهِ وَكَذَّبَ بِالصِّدْقِ إِذْ جَاءَهُ ۚ أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَافِرِينَ
तो इससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो ख़ुदा पर झूठ (तूफान) बाँधे और जब उसके पास सच्ची बात आए तो उसको झुठला दे क्या जहन्नुम में कााफिरों का ठिकाना नहीं है
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीRevelation
30आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 30

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Tuesday, August 18, 2026

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