अन-निसा · 37/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
الَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبُخْلِ وَيَكْتُمُونَ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَأَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ عَذَابًا مُّهِينًا ۝٣٧
Allazeena yabkhaloona wa yaamuroonan naasa bilbukhli wa yaktumoona maaa aataahu mullaahu min fadlih; wa a`tadnaa lilkaafireena `azaabam muheenaa
📖 हिंदी अर्थ
ये वह लोग हैं जो ख़ुद तो बुख्ल करते ही हैं और लोगों को भी बुख्ल का हुक्म देते हैं और जो माल ख़ुदा ने अपने फ़ज़ल व (करम) से उन्हें दिया है उसे छिपाते हैं और हमने तो कुफ़राने नेअमत करने वालों के वास्ते सख्त ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَبْخَلُونَ (यब्खलून): कंजूसी करते हैं, ख़र्च नहीं करते।
  • بِالْبُخْلِ (बिल-बुख्ल): कंजूसी पर।
  • وَيَكْتُمُونَ (व यकतुमून): छिपाते हैं।
  • مِن فَضْلِهِ (मिन फ़ज़्लिही): अपनी देन से, अपनी रहमत से।
  • وَأَعْتَدْنَا (व आ'तदना): हमने तैयार कर रखा है।
  • مُهِينًا (मुहीनन): अपमानित करने वाला, ज़लील करने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के बारे में है जो अल्लाह की दी हुई नेमतों पर कंजूसी करते हैं, यानी अपने माल, ज्ञान, या किसी भी नेमत को दूसरों के साथ साझा नहीं करते। वे न केवल खुद कंजूसी करते हैं, बल्कि दूसरे लोगों को भी कंजूसी करने का आदेश देते हैं, यानी अपने कहने और अपने कर्मों से लोगों को भलाई और ख़र्च करने से रोकते हैं। वे अल्लाह की उन नेमतों को छिपाते हैं जो उसने उन्हें दी हैं, चाहे वह धन हो, ज्ञान हो, या नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सच्चाई की गवाही हो। वे सच्चाई को लोगों से छिपाकर झूठ को फैलाते हैं। ये सारी आदतें कुफ्र की निशानियाँ हैं। अल्लाह ने ऐसे काफिरों के लिए अपमानजनक और ज़लील करने वाला अज़ाब तैयार कर रखा है, जिसमें वे हमेशा रहेंगे और जिससे उन्हें बहुत शर्मिंदगी और दर्द उठाना पड़ेगा।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि कंजूसी एक बुरी आदत है, और इससे भी बुरा यह है कि इंसान दूसरों को भी कंजूसी की तरफ उभारे। मुसलमान को चाहिए कि वह खुद सखावत (उदारता) अपनाए और दूसरों को भी भलाई और ख़र्च करने की तरफ प्रोत्साहित करे।
  2. अल्लाह की नेमतों को छिपाना, चाहे वह ज्ञान हो या धन, गुनाह है। अल्लाह ने जो ज्ञान दिया है, उसे लोगों तक पहुँचाना चाहिए, और जो धन दिया है, उसमें से दूसरों का हक़ अदा करना चाहिए।
  3. यह आयत हमें चेतावनी देती है कि अल्लाह की नेमतों का इनकार और उन्हें छिपाना कुफ्र की निशानी है, और इसका अंजाम अपमानजनक अज़ाब है। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और अपनी नेमतों को दूसरों के साथ बाँटना चाहिए।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, क्योंकि उसने उन्हें नेमतें दीं, लेकिन जो इन नेमतों का सही उपयोग नहीं करते और कंजूसी करते हैं, वे अल्लाह की रहमत से दूर हो जाते हैं। मुसलमान को चाहिए कि वह अल्लाह की रहमत के करीब रहने के लिए सखी और फ़ैयाज़ बने।


📜 आयत 35-39 — अन-निसा

35وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَابْعَثُوا حَكَمًا مِّنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِّنْ أَهْلِهَا إِن يُرِيدَا إِصْلَاحًا يُوَفِّقِ اللَّهُ بَيْنَهُمَا ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيمًا خَبِيرًا
और ऐ हुक्काम (वक्त) अगर तुम्हें मियॉ बीवी की पूरी नाइत्तेफ़ाक़ी का तरफैन से अन्देशा हो तो एक सालिस (पन्च) मर्द के कुनबे में से एक और सालिस औरत के कुनबे में मुक़र्रर करो अगर ये दोनों सालिस दोनों में मेल करा देना चाहें तो ख़ुदा उन दोनों के दरमियान उसका अच्छा बन्दोबस्त कर देगा ख़ुदा तो बेशक वाक़िफ व ख़बरदार है
36۞ وَاعْبُدُوا اللَّهَ وَلَا تُشْرِكُوا بِهِ شَيْئًا ۖ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا وَبِذِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَالْجَارِ ذِي الْقُرْبَىٰ وَالْجَارِ الْجُنُبِ وَالصَّاحِبِ بِالْجَنبِ وَابْنِ السَّبِيلِ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ مُخْتَالًا فَخُورًا
और ख़ुदा ही की इबादत करो और किसी को उसका शरीक न बनाओ और मॉ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और रिश्तेदार पड़ोसियों और अजनबी पड़ोसियों और पहलू में बैठने वाले मुसाहिबों और पड़ोसियों और ज़र ख़रीद लौन्डी और गुलाम के साथ एहसान करो बेशक ख़ुदा अकड़ के चलने वालों और शेख़ीबाज़ों को दोस्त नहीं रखता
37الَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبُخْلِ وَيَكْتُمُونَ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَأَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ عَذَابًا مُّهِينًا
ये वह लोग हैं जो ख़ुद तो बुख्ल करते ही हैं और लोगों को भी बुख्ल का हुक्म देते हैं और जो माल ख़ुदा ने अपने फ़ज़ल व (करम) से उन्हें दिया है उसे छिपाते हैं और हमने तो कुफ़राने नेअमत करने वालों के वास्ते सख्त ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है
38وَالَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ رِئَاءَ النَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَلَا بِالْيَوْمِ الْآخِرِ ۗ وَمَن يَكُنِ الشَّيْطَانُ لَهُ قَرِينًا فَسَاءَ قَرِينًا
और जो लोग महज़ लोगों को दिखाने के वास्ते अपने माल ख़र्च करते हैं और न खुदा ही पर ईमान रखते हैं और न रोजे आख़ेरत पर ख़ुदा भी उनके साथ नहीं क्योंकि उनका साथी तो शैतान है और जिसका साथी शैतान हो तो क्या ही बुरा साथी है
39وَمَاذَا عَلَيْهِمْ لَوْ آمَنُوا بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَأَنفَقُوا مِمَّا رَزَقَهُمُ اللَّهُ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِهِمْ عَلِيمًا
अगर ये लोग ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाते और जो कुछ ख़ुदा ने उन्हें दिया है उसमें से राहे ख़ुदा में ख़र्च करते तो उन पर क्या आफ़त आ जाती और ख़ुदा तो उनसे ख़ूब वाक़िफ़ है
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अनुवाद — अन-निसा 37

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Tuesday, August 18, 2026

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