Wa izaa qeela lahum ta`aalaw ilaa maaa anzalallaahu wa ilar Rasooli ra aital munaafiqeena yasuddoona `anka sudoodaa
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा ने जो किताब नाज़िल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफ़िक़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुंह फेर लेते हैं
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اور جب ان سے کہا جاتا ہے کہ جو حکم خدا نے نازل فرمایا ہے اس کی طرف (رجوع کرو) اور پیغمبر کی طرف آؤ تو تم منافقوں کو دیکھتے ہو کہ تم سے اعراض کرتے اور رکے جاتے ہیں
जब इन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) से कहा जाता है कि "आओ, उस किताब की ओर चलो जो अल्लाह ने उतारी है, और रसूल (ﷺ) की ओर चलो, ताकि वे तुम्हारे झगड़ों और विवादों का फ़ैसला अल्लाह की वही के अनुसार करें," तो आप (ऐ नबी ﷺ) देखते हैं कि ये मुनाफ़िक़ आपसे पूरी तरह मुँह मोड़ लेते हैं और आपकी ओर आने से सख़्त इनकार करते हैं। वे अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत की ओर रुजू करने के बजाय अपनी मनमानी और जाहिलियत के दौर के क़ानूनों की ओर जाना पसंद करते हैं। उनका यह विमुख होना केवल एक साधारण इनकार नहीं, बल्कि पूर्ण घृणा और अरुचि पर आधारित है, क्योंकि उनके दिलों में ईमान नहीं बल्कि कुफ़्र छिपा हुआ है। वे ज़बान से तो ईमान का दावा करते हैं, लेकिन जब सच्चाई और इंसाफ़ की बात आती है, तो वे उससे भागते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि अल्लाह और उसके रसूल का फ़ैसला उनके स्वार्थों के ख़िलाफ़ होगा।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
अल्लाह और रसूल की ओर रुजू करना ही सच्चे ईमान की निशानी है – जो व्यक्ति सच्चा मुसलमान होता है, वह हर मामले में अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत को ही अपना फ़ैसला मानता है, चाहे उसके स्वार्थों पर चोट ही क्यों न पड़े।
मुनाफ़िक़ी की पहचान – यह आयत हमें सिखाती है कि मुनाफ़िक़ों की पहचान यह है कि वे अल्लाह और रसूल की ओर बुलाए जाने पर विमुख हो जाते हैं। यह उनके दिल की बीमारी का प्रमाण है।
क़ुरआन और सुन्नत ही इंसाफ़ का एकमात्र स्रोत हैं – इस आयत से पता चलता है कि मुसलमानों के आपसी झगड़ों का हल अल्लाह की वही और रसूल की सुन्नत में है, न कि मानवीय क़ानूनों या जाहिलियत के रीति-रिवाजों में।
सच्चे ईमान की मांग – यह आयत हर मुसलमान को यह सबक देती है कि वह अपने जीवन के हर क्षेत्र में क़ुरआन और सुन्नत को प्राथमिकता दे, और किसी भी हालत में उनसे विमुख न हो, क्योंकि यही उसकी कामयाबी और निजात का रास्ता है।
और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा ने जो किताब नाज़िल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफ़िक़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुंह फेर लेते हैं
ऐ ईमानदारों ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की और जो तुममें से साहेबाने हुकूमत हों उनकी इताअत करो और अगर तुम किसी बात में झगड़ा करो पस अगर तुम ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हो तो इस अम्र में ख़ुदा और रसूल की तरफ़ रूजू करो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अन्जाम की राह से बहुत अच्छा है
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों की (हालत) पर नज़र नहीं की जो ये ख्याली पुलाओ पकाते हैं कि जो किताब तुझ पर नाज़िल की गयी और जो किताबें तुम से पहले नाज़िल की गयी (सब पर ईमान है) लाए और दिली तमन्ना ये है कि सरकशों को अपना हाकिम बनाएं हालॉकि उनको हुक्म दिया गया कि उसकी बात न मानें और शैतान तो यह चाहता है कि उन्हें बहका के बहुत दूर ले जाए
और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा ने जो किताब नाज़िल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफ़िक़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुंह फेर लेते हैं
कि जब उनपर उनके करतूत की वजह से कोई मुसीबत पड़ती है तो क्योंकर तुम्हारे पास ख़ुदा की क़समें खाते हैं कि हमारा मतलब नेकी और मेल मिलाप के सिवा कुछ न था ये वह लोग हैं कि कुछ ख़ुदा ही उनके दिल की हालत ख़ूब जानता है
पस तुम उनसे दरगुज़र करो और उनको नसीहत करो और उनसे उनके दिल में असर करने वाली बात कहो और हमने कोई रसूल नहीं भेजा मगर इस वास्ते कि ख़ुदा के हुक्म से लोग उसकी इताअत करें
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