अन-निसा · 61/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا إِلَىٰ مَا أَنزَلَ اللَّهُ وَإِلَى الرَّسُولِ رَأَيْتَ الْمُنَافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُودًا ۝٦١
Wa izaa qeela lahum ta`aalaw ilaa maaa anzalallaahu wa ilar Rasooli ra aital munaafiqeena yasuddoona `anka sudoodaa
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा ने जो किताब नाज़िल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफ़िक़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुंह फेर लेते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَعَالَوْا – आओ, चलो
  • يَصُدُّونَ – वे मुँह मोड़ते हैं, विमुख होते हैं
  • صُدُودًا – पूर्ण रूप से घृणा और विमुखता के साथ

तफ़सीर (व्याख्या):

जब इन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) से कहा जाता है कि "आओ, उस किताब की ओर चलो जो अल्लाह ने उतारी है, और रसूल (ﷺ) की ओर चलो, ताकि वे तुम्हारे झगड़ों और विवादों का फ़ैसला अल्लाह की वही के अनुसार करें," तो आप (ऐ नबी ﷺ) देखते हैं कि ये मुनाफ़िक़ आपसे पूरी तरह मुँह मोड़ लेते हैं और आपकी ओर आने से सख़्त इनकार करते हैं। वे अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत की ओर रुजू करने के बजाय अपनी मनमानी और जाहिलियत के दौर के क़ानूनों की ओर जाना पसंद करते हैं। उनका यह विमुख होना केवल एक साधारण इनकार नहीं, बल्कि पूर्ण घृणा और अरुचि पर आधारित है, क्योंकि उनके दिलों में ईमान नहीं बल्कि कुफ़्र छिपा हुआ है। वे ज़बान से तो ईमान का दावा करते हैं, लेकिन जब सच्चाई और इंसाफ़ की बात आती है, तो वे उससे भागते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि अल्लाह और उसके रसूल का फ़ैसला उनके स्वार्थों के ख़िलाफ़ होगा।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह और रसूल की ओर रुजू करना ही सच्चे ईमान की निशानी है – जो व्यक्ति सच्चा मुसलमान होता है, वह हर मामले में अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत को ही अपना फ़ैसला मानता है, चाहे उसके स्वार्थों पर चोट ही क्यों न पड़े।
  2. मुनाफ़िक़ी की पहचान – यह आयत हमें सिखाती है कि मुनाफ़िक़ों की पहचान यह है कि वे अल्लाह और रसूल की ओर बुलाए जाने पर विमुख हो जाते हैं। यह उनके दिल की बीमारी का प्रमाण है।
  3. क़ुरआन और सुन्नत ही इंसाफ़ का एकमात्र स्रोत हैं – इस आयत से पता चलता है कि मुसलमानों के आपसी झगड़ों का हल अल्लाह की वही और रसूल की सुन्नत में है, न कि मानवीय क़ानूनों या जाहिलियत के रीति-रिवाजों में।
  4. सच्चे ईमान की मांग – यह आयत हर मुसलमान को यह सबक देती है कि वह अपने जीवन के हर क्षेत्र में क़ुरआन और सुन्नत को प्राथमिकता दे, और किसी भी हालत में उनसे विमुख न हो, क्योंकि यही उसकी कामयाबी और निजात का रास्ता है।


📜 आयत 59-63 — अन-निसा

59يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنكُمْ ۖ فَإِن تَنَازَعْتُمْ فِي شَيْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللَّهِ وَالرَّسُولِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا
ऐ ईमानदारों ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की और जो तुममें से साहेबाने हुकूमत हों उनकी इताअत करो और अगर तुम किसी बात में झगड़ा करो पस अगर तुम ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हो तो इस अम्र में ख़ुदा और रसूल की तरफ़ रूजू करो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अन्जाम की राह से बहुत अच्छा है
60أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُمْ آمَنُوا بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَا أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ يُرِيدُونَ أَن يَتَحَاكَمُوا إِلَى الطَّاغُوتِ وَقَدْ أُمِرُوا أَن يَكْفُرُوا بِهِ وَيُرِيدُ الشَّيْطَانُ أَن يُضِلَّهُمْ ضَلَالًا بَعِيدًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों की (हालत) पर नज़र नहीं की जो ये ख्याली पुलाओ पकाते हैं कि जो किताब तुझ पर नाज़िल की गयी और जो किताबें तुम से पहले नाज़िल की गयी (सब पर ईमान है) लाए और दिली तमन्ना ये है कि सरकशों को अपना हाकिम बनाएं हालॉकि उनको हुक्म दिया गया कि उसकी बात न मानें और शैतान तो यह चाहता है कि उन्हें बहका के बहुत दूर ले जाए
61وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا إِلَىٰ مَا أَنزَلَ اللَّهُ وَإِلَى الرَّسُولِ رَأَيْتَ الْمُنَافِقِينَ يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُودًا
और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा ने जो किताब नाज़िल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफ़िक़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुंह फेर लेते हैं
62فَكَيْفَ إِذَا أَصَابَتْهُم مُّصِيبَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ ثُمَّ جَاءُوكَ يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنْ أَرَدْنَا إِلَّا إِحْسَانًا وَتَوْفِيقًا
कि जब उनपर उनके करतूत की वजह से कोई मुसीबत पड़ती है तो क्योंकर तुम्हारे पास ख़ुदा की क़समें खाते हैं कि हमारा मतलब नेकी और मेल मिलाप के सिवा कुछ न था ये वह लोग हैं कि कुछ ख़ुदा ही उनके दिल की हालत ख़ूब जानता है
63أُولَٰئِكَ الَّذِينَ يَعْلَمُ اللَّهُ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَعِظْهُمْ وَقُل لَّهُمْ فِي أَنفُسِهِمْ قَوْلًا بَلِيغًا
पस तुम उनसे दरगुज़र करो और उनको नसीहत करो और उनसे उनके दिल में असर करने वाली बात कहो और हमने कोई रसूल नहीं भेजा मगर इस वास्ते कि ख़ुदा के हुक्म से लोग उसकी इताअत करें
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अनुवाद — अन-निसा 61

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Tuesday, August 18, 2026

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