अल-जासिया · 21/37
अनुवाद उच्चारण — अल-जासिया
أَمْ حَسِبَ الَّذِينَ اجْتَرَحُوا السَّيِّئَاتِ أَن نَّجْعَلَهُمْ كَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَوَاءً مَّحْيَاهُمْ وَمَمَاتُهُمْ ۚ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ ۝٢١
Am hasibal lazeenaj tarahus saiyiaati an naj`alahum kallazeena aamanoo wa `amilu saalihaati sawaaa`am mahyaahum wa mamaatuhum; saaa`a maa yahkumoon
📖 हिंदी अर्थ
जो लोग बुरा काम किया करते हैं क्या वह ये समझते हैं कि हम उनको उन लोगों के बराबर कर देंगे जो ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम भी करते रहे और उन सब का जीना मरना एक सा होगा ये लोग (क्या) बुरे हुक्म लगाते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • اجْتَرَحُوا – कमाए, अर्जित किए
  • السَّيِّئَاتِ – बुरे कर्म, पाप
  • سَوَاءً – बराबर, समान
  • مَّحْيَاهُمْ – उनका जीवन
  • مَمَاتُهُمْ – उनकी मृत्यु
  • سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ – बहुत बुरा है जो वे फ़ैसला करते हैं

तफ़सीर:

क्या वे लोग, जिन्होंने अपने हाथों से बुराइयाँ कमाईं, अल्लाह के रसूलों को झुठलाया, अपने रब के हुक्मों की अवहेलना की और उसके सिवा दूसरों की इबादत की, यह समझ बैठे हैं कि हम उन्हें उन लोगों के बराबर कर देंगे जो ईमान लाए, अच्छे कर्म किए और सिर्फ़ अल्लाह की इबादत में अपना जीवन बिताया? क्या वे सोचते हैं कि दुनिया और आख़िरत में उनका हाल एक जैसा होगा?

यह सोचना कितनी बड़ी भूल है! अल्लाह तआला ने दुनिया में काफ़िर और मोमिन को जीवन के साधन दिए, दोनों खाते-पीते हैं, दोनों को सेहत और बीमारी आती है, लेकिन यह समानता सिर्फ़ दुनिया तक है। आख़िरत में दोनों का हाल हरगिज़ एक जैसा नहीं होगा। मोमिन की मौत ईमान पर होती है और उसे जन्नत मिलती है, जबकि काफ़िर की मौत कुफ्र पर होती है और उसका अंजाम जहन्नम है। जैसे उनके जीवन और मृत्यु में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है, वैसे ही उनके अंजाम में भी बहुत बड़ा फ़र्क़ होगा।

यह कैसा बुरा फ़ैसला है जो ये लोग करते हैं! वे पापियों और नेक लोगों को एक दर्जे पर रखते हैं, जबकि अल्लाह की रहमत और अद्ल इससे कहीं बेहतर है। अल्लाह ने अपने बंदों पर ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि हर एक को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी नसीहत है कि हम अपने जीवन को संवारें, अच्छे कर्म करें और अल्लाह की राह पर चलें। जो लोग बुराइयों में लिप्त हैं, वे यह न समझें कि उनका अंजाम नेक लोगों जैसा होगा। अल्लाह का इन्साफ़ बिल्कुल सटीक है – वह हर अच्छे और बुरे कर्म का हिसाब लेगा। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन को अल्लाह की इबादत और अच्छे कर्मों से रोशन करें, ताकि हमारा जीवन और मृत्यु दोनों अल्लाह की रहमत से भरे हों।



📜 आयत 19-23 — अल-जासिया

19إِنَّهُمْ لَن يُغْنُوا عَنكَ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ وَإِنَّ الظَّالِمِينَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۖ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُتَّقِينَ
ये लोग ख़ुदा के सामने तुम्हारे कुछ भी काम न आएँगे और ज़ालिम लोग एक दूसरे के मददगार हैं और ख़ुदा तो परहेज़गारों का मददगार है
20هَٰذَا بَصَائِرُ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
ये (क़ुरान) लोगों (की) हिदायत के लिए दलीलो का मजमूआ है और बातें करने वाले लोगों के लिए (अज़सरतापा) हिदायत व रहमत है
21أَمْ حَسِبَ الَّذِينَ اجْتَرَحُوا السَّيِّئَاتِ أَن نَّجْعَلَهُمْ كَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَوَاءً مَّحْيَاهُمْ وَمَمَاتُهُمْ ۚ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ
जो लोग बुरा काम किया करते हैं क्या वह ये समझते हैं कि हम उनको उन लोगों के बराबर कर देंगे जो ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम भी करते रहे और उन सब का जीना मरना एक सा होगा ये लोग (क्या) बुरे हुक्म लगाते हैं
22وَخَلَقَ اللَّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ وَلِتُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
और ख़ुदा ने सारे आसमान व ज़मीन को हिकमत व मसलेहत से पैदा किया और ताकि हर शख़्श को उसके किये का बदला दिया जाए और उन पर (किसी तरह का) ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
23أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ وَأَضَلَّهُ اللَّهُ عَلَىٰ عِلْمٍ وَخَتَمَ عَلَىٰ سَمْعِهِ وَقَلْبِهِ وَجَعَلَ عَلَىٰ بَصَرِهِ غِشَاوَةً فَمَن يَهْدِيهِ مِن بَعْدِ اللَّهِ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
भला तुमने उस शख़्श को भी देखा है जिसने अपनी नफसियानी ख़वाहिशों को माबूद बना रखा है और (उसकी हालत) समझ बूझ कर ख़ुदा ने उसे गुमराही में छोड़ दिया है और उसके कान और दिल पर अलामत मुक़र्रर कर दी है (कि ये ईमान न लाएगा) और उसकी ऑंख पर पर्दा डाल दिया है फिर ख़ुदा के बाद उसकी हिदायत कौन कर सकता है तो क्या तुम लोग (इतना भी) ग़ौर नहीं करते
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अनुवाद — अल-जासिया 21

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Tuesday, August 18, 2026

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