अल-माइदा · 74/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
أَفَلَا يَتُوبُونَ إِلَى اللَّهِ وَيَسْتَغْفِرُونَهُ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ۝٧٤
Afalaa yatooboona ilal laahi wa yastaghfiroonah; wallaahu Ghafoorur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
तो ये लोग ख़ुदा की बारगाह में तौबा क्यों नहीं करते और अपने (क़सूरों की) माफ़ी क्यों नहीं मॉगते हालॉकि ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَتُوبُونَ – तौबा करें, पलटें
  • يَسْتَغْفِرُونَهُ – उससे क्षमा माँगें
  • غَفُورٌ – अत्यंत क्षमाशील
  • رَحِيمٌ – अत्यंत दयालु

तफ़सीर (व्याख्या):

क्या ये ईसाई अपनी उस ग़लत बात (ईसा अलैहिस्सलाम को ईश्वर का पुत्र कहना) से बाज़ नहीं आएँगे? क्या वे अल्लाह की ओर तौबा नहीं करेंगे और उससे अपने कुकर्मों की क्षमा नहीं माँगेंगे? अल्लाह तआला उन लोगों के पापों को माफ़ करने के लिए तैयार है जो सच्चे दिल से तौबा करें। वह अपने बंदों पर अत्यंत कृपालु और दयावान है। यदि वे अपनी ग़लत मान्यताओं को छोड़कर अल्लाह की ओर लौट आएँ, तो अल्लाह उनके सभी पापों को क्षमा कर देगा, चाहे वे कितने ही बड़े क्यों न हों, यहाँ तक कि शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार ठहराना) भी क्षमा किया जा सकता है, बशर्ते वे ईमान लाएँ और तौबा करें।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह तआला की रहमत असीम है – वह हर पाप को क्षमा करने के लिए तैयार है, बशर्ते बंदा सच्चे दिल से तौबा करे। यह अल्लाह की महान दया का प्रमाण है कि उसने अपने बंदों के लिए तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला रखा है।
  2. इस्लाम में निराशा की कोई गुंजाइश नहीं – चाहे इंसान कितना ही बड़ा गुनाहगार क्यों न हो, अल्लाह की क्षमा की उम्मीद हमेशा बनी रहती है। यह बात इंसान को गुनाह के बाद मायूसी से बचाती है और उसे सुधार का रास्ता दिखाती है।
  3. तौबा का अर्थ केवल ज़बान से माफ़ी माँगना नहीं, बल्कि ग़लत मान्यताओं और कर्मों को त्यागना है – सच्ची तौबा वही है जो दिल से हो और अमल में बदलाव लाए।
  4. यह आयत दर्शाती है कि इस्लाम का पैग़ाम सभी मानवजाति के लिए है – चाहे वे किसी भी धर्म या पंथ से हों, उन्हें सच्चाई की ओर बुलाया जाता है और उनके लिए क्षमा का दरवाज़ा खुला है।
  5. अल्लाह की क्षमा और दया का वर्णन करके यह आयत लोगों को अल्लाह की ओर आकर्षित करती है और उनके दिलों में उसकी रहमत की उम्मीद पैदा करती है, जो इस्लाम की सबसे बड़ी विशेषता है।


📜 आयत 72-76 — अल-माइदा

72لَقَدْ كَفَرَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ هُوَ الْمَسِيحُ ابْنُ مَرْيَمَ ۖ وَقَالَ الْمَسِيحُ يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ اعْبُدُوا اللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ ۖ إِنَّهُ مَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ حَرَّمَ اللَّهُ عَلَيْهِ الْجَنَّةَ وَمَأْوَاهُ النَّارُ ۖ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ
जो लोग उसके क़ायल हैं कि मरियम के बेटे ईसा मसीह ख़ुदा हैं वह सब काफ़िर हैं हालॉकि मसीह ने ख़ुद यूं कह दिया था कि ऐ बनी इसराईल सिर्फ उसी ख़ुदा की इबादत करो जो हमारा और तुम्हारा पालने वाला है क्योंकि (याद रखो) जिसने ख़ुदा का शरीक बनाया उस पर ख़ुदा ने बेहिश्त को हराम कर दिया है और उसका ठिकाना जहन्नुम है और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं
73لَّقَدْ كَفَرَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ ثَالِثُ ثَلَاثَةٍ ۘ وَمَا مِنْ إِلَٰهٍ إِلَّا إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۚ وَإِن لَّمْ يَنتَهُوا عَمَّا يَقُولُونَ لَيَمَسَّنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
जो लोग इसके क़ायल हैं कि ख़ुदा तीन में का (तीसरा) है वह यक़ीनन काफ़िर हो गए (याद रखो कि) ख़ुदाए यकता के सिवा कोई माबूद नहीं और (ख़ुदा के बारे में) ये लोग जो कुछ बका करते हैं अगर उससे बाज़ न आए तो (समझ रखो कि) जो लोग उसमें से (काफ़िर के) काफ़िर रह गए उन पर ज़रूर दर्दनाक अज़ाब नाज़िल होगा
74أَفَلَا يَتُوبُونَ إِلَى اللَّهِ وَيَسْتَغْفِرُونَهُ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
तो ये लोग ख़ुदा की बारगाह में तौबा क्यों नहीं करते और अपने (क़सूरों की) माफ़ी क्यों नहीं मॉगते हालॉकि ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
75مَّا الْمَسِيحُ ابْنُ مَرْيَمَ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ الرُّسُلُ وَأُمُّهُ صِدِّيقَةٌ ۖ كَانَا يَأْكُلَانِ الطَّعَامَ ۗ انظُرْ كَيْفَ نُبَيِّنُ لَهُمُ الْآيَاتِ ثُمَّ انظُرْ أَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
मरियम के बेटे मसीह तो बस एक रसूल हैं और उनके क़ब्ल (और भी) बहुतेरे रसूल गुज़र चुके हैं और उनकी मॉ भी (ख़ुदा की) एक सच्ची बन्दी थी (और आदमियों की तरह) ये दोनों (के दोनों भी) खाना खाते थे (ऐ रसूल) ग़ौर तो करो हम अपने एहकाम इनसे कैसा साफ़ साफ़ बयान करते हैं
76قُلْ أَتَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا ۚ وَاللَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
फिर देखो तो कि (उसपर भी उलटे) ये लोग कहॉ भटके जा रहे हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम ख़ुदा (जैसे क़ादिर व तवाना) को छोड़कर (ऐसी ज़लील) चीज़ की इबादत करते हो जिसको न तो नुक़सान ही इख्तेयार है और न नफ़े का और ख़ुदा तो (सबकी) सुनता (और सब कुछ) जानता है
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अनुवाद — अल-माइदा 74

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Tuesday, August 18, 2026

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