अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ: वे लोग जिन्हें हमने किताब (तौरात और इंजील) दी।
- يَعْرِفُونَهُ: वे उसे (मुहम्मद ﷺ को) पहचानते हैं।
- كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمْ: जैसे वे अपने बेटों को पहचानते हैं।
- خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ: उन्होंने अपने आप को घाटे में डाला (अपने नुक़्सान का कारण बने)।
- فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ: इसलिए वे ईमान नहीं लाते।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन यहूदियों और ईसाइयों के बारे में बताती है जिन्हें अल्लाह ने तौरात और इंजील दी थी। वे हज़रत मुहम्मद ﷺ को उनकी उन विशेषताओं और निशानियों के कारण बिल्कुल स्पष्ट रूप से पहचानते थे जो उनकी किताबों में लिखी हुई थीं। उनकी यह पहचान इतनी पक्की और स्पष्ट थी जितनी किसी व्यक्ति को अपने बेटे की पहचान होती है — जैसे एक पिता अपने बेटे को किसी और से भ्रमित नहीं करता, उसी तरह वे मुहम्मद ﷺ को उनके सच्चे नबी होने के बारे में किसी संदेह में नहीं थे। उनकी किताबों में उनके नाम, गुण, आने का समय, और उनके दीन की विशेषताएँ स्पष्ट रूप से मौजूद थीं।
इसके बावजूद, उन्होंने अपनी हवस (इच्छाओं) और दुनियावी मोह की पैरवी की, अपने बड़ों की अंधी नक़ल की, और सच्चाई को ठुकरा दिया। उन्होंने अपनी जानों को घाटे में डाल दिया — यानी अपने आप को जहन्नम की आग का हक़दार बना लिया — क्योंकि उन्होंने मुहम्मद ﷺ पर और उनके लाए हुए दीन पर ईमान नहीं लाया। उनका यह इनकार ज्ञान की कमी के कारण नहीं था, बल्कि जिद, हठ और सच्चाई से मुँह मोड़ने के कारण था। यही उनका सबसे बड़ा नुक़्सान था।
फ़ायदे (सबक़):
- यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई को पहचानने के बाद उसे क़बूल करना हर इंसान की ज़िम्मेदारी है। ज्ञान के बावजूद इनकार करना सबसे बड़ा घाटा है।
- अल्लाह ने अपने नबियों के आने की ख़बरें पहले की किताबों में दीं, जिससे यह साबित होता है कि इस्लाम कोई नई किताब नहीं, बल्कि उन्हीं सच्चे दीनों की पूर्णता है जो पहले आए थे।
- इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि इंसान को अपनी जान को घाटे में नहीं डालना चाहिए — यानी अपने आप को अल्लाह की नाफ़रमानी से बचाना चाहिए, क्योंकि सबसे बड़ा नुक़्सान अपने आप को अल्लाह की रहमत से दूर करना है।
- यह आयत मुसलमानों को यक़ीन दिलाती है कि मुहम्मद ﷺ का नबूवत का दावा सच्चा है, क्योंकि उसकी गवाही पहले की किताबों में मौजूद थी, और यह हमारे ईमान की मज़बूती का ज़रिया है।
📜 आयत 18-22 — अल-अनआम
अनुवाद — अल-अनआम 20
सूरा अल-अनआम आयत 20 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मै तो उनसे बेज़र हूँ जिन लोगों को हमने किताब…सूरा आयत 20/165 — अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अनआम सुनें, अल-अनआम अनुवाद, अल-अनआम mp3, अल-अनआम pdf. आयत 18–22. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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