अल-अनआम · 21/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِآيَاتِهِ ۗ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ ۝٢١
Wa man azlamu mim manif tara `alal laahi kaziban aw kazzaba bi Aayaatih; innahoo laa yuflihuz zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो शख़्श ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या उसकी आयतों को झुठलाए उससे बढ़के ज़ालिम कौन होगा और ज़ालिमों को हरगिज़ नजात न होगी
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا: अल्लाह पर झूठ गढ़ना, अर्थात् उसके बारे में ऐसी बातें कहना जो सत्य न हों, जैसे उसका कोई साझीदार, संतान या पत्नी होना।
  • كَذَّبَ بِآيَاتِهِ: उसकी आयतों (निशानियों, प्रमाणों और उतारी गई वही) को झुठलाना।
  • لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ: अत्याचारी सफल नहीं होते, न दुनिया में उन्हें सच्ची कामयाबी मिलती है और न आख़िरत में।

तफ़सीर:

इस आयत में अल्लाह तआला सबसे बड़े अत्याचार का उल्लेख कर रहे हैं। वह पूछते हैं: उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी और कौन हो सकता है जो अल्लाह पर झूठ गढ़े — यानी उसके साथ किसी को साझीदार ठहराए, उसके लिए संतान या पत्नी होने का दावा करे, या उसके बारे में ऐसी बातें कहे जो उसकी पवित्रता के खिलाफ़ हों? और यह भी कि जो उसकी आयतों को झुठलाए — चाहे वे आयतें क़ुरआन की हों या अल्लाह द्वारा अपने रसूलों के माध्यम से भेजे गए प्रमाण और निशानियाँ।

यह अत्याचार अपनी जड़ों में सबसे बड़ा है, क्योंकि यह अल्लाह की सत्ता और उसकी इबादत के एकाधिकार को चुनौती देता है। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे अत्याचारी कभी सफल नहीं होंगे — न दुनिया में उन्हें वास्तविक भलाई और शांति मिलेगी, और न आख़िरत में। उनका अंजाम केवल घाटा और विनाश है, जब तक कि वे तौबा न कर लें और अपने किए पर पछतावा न करें। यदि वे इसी हाल में मर गए, तो उनका ठिकाना जहन्नम है।

फ़ायदे:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सबसे बड़ा अत्याचार अल्लाह के साथ किसी को साझीदार ठहराना या उसकी आयतों को झुठलाना है। इससे बचना हर मुसलमान का पहला कर्तव्य है।
  2. यह हमें चेतावनी देती है कि अत्याचार का अंतिम परिणाम कभी अच्छा नहीं होता। भले ही दुनिया में अत्याचारी कुछ समय के लिए सुख-सुविधाएँ पा ले, लेकिन असली सफलता उसी को मिलती है जो अल्लाह की इबादत में एकनिष्ठ हो और उसके प्रमाणों को स्वीकार करे।
  3. यह आयत हमें अल्लाह की ओर लौटने की प्रेरणा देती है — कि हम अपने जीवन को शिर्क और झुठलाने से पाक रखें, और सच्ची तौबा के साथ उसकी ओर रुजू करें, क्योंकि अल्लाह तौबा करने वालों को क्षमा कर देता है और उन्हें सफलता प्रदान करता है।
  4. यह हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की आयतें — चाहे वे क़ुरआन हों या ब्रह्मांड में फैली उसकी निशानियाँ — हमारे लिए मार्गदर्शन का स्रोत हैं। इन पर विचार करना और इन्हें स्वीकार करना ही हमारी भलाई का रास्ता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 19-23 — अल-अनआम

19قُلْ أَيُّ شَيْءٍ أَكْبَرُ شَهَادَةً ۖ قُلِ اللَّهُ ۖ شَهِيدٌ بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ ۚ وَأُوحِيَ إِلَيَّ هَٰذَا الْقُرْآنُ لِأُنذِرَكُم بِهِ وَمَن بَلَغَ ۚ أَئِنَّكُمْ لَتَشْهَدُونَ أَنَّ مَعَ اللَّهِ آلِهَةً أُخْرَىٰ ۚ قُل لَّا أَشْهَدُ ۚ قُلْ إِنَّمَا هُوَ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ وَإِنَّنِي بَرِيءٌ مِّمَّا تُشْرِكُونَ
(ऐ रसूल) तुम पूछो कि गवाही में सबसे बढ़के कौन चीज़ है तुम खुद ही कह दो कि मेरे और तुम्हारे दरमियान ख़ुदा गवाह है और मेरे पास ये क़ुरान वही के तौर पर इसलिए नाज़िल किया गया ताकि मैं तुम्हें और जिसे (उसकी) ख़बर पहुँचे उसके ज़रिए से डराओ क्या तुम यक़ीनन यह गवाही दे सकते हो कि अल्लाह के साथ और दूसरे माबूद भी हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मै तो उसकी गवाही नहीं देता (तुम दिया करो) तुम (उन लोगों से) कहो कि वह तो बस एक ही ख़ुदा है और जिन चीज़ों को तुम (ख़ुदा का) शरीक बनाते हो
20الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمُ ۘ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
मै तो उनसे बेज़र हूँ जिन लोगों को हमने किताब अता फरमाई है (यहूद व नसारा) वह तो जिस तरह अपने बाल बच्चों को पहचानते है उसी तरह उस नबी (मोहम्मद) को भी पहचानते हैं (मगर) जिन लोगों ने अपना आप नुक़सान किया वह तो (किसी तरह) ईमान न लाएंगें
21وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِآيَاتِهِ ۗ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ
और जो शख़्श ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या उसकी आयतों को झुठलाए उससे बढ़के ज़ालिम कौन होगा और ज़ालिमों को हरगिज़ नजात न होगी
22وَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذِينَ أَشْرَكُوا أَيْنَ شُرَكَاؤُكُمُ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
और (उस दिन को याद करो) जिस दिन हम उन सबको जमा करेंगे फिर जिन लोगों ने शिर्क किया उनसे पूछेगें कि जिनको तुम (ख़ुदा का) शरीक ख्याल करते थे कहाँ हैं
23ثُمَّ لَمْ تَكُن فِتْنَتُهُمْ إِلَّا أَن قَالُوا وَاللَّهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِكِينَ
फिर उनकी कोई शरारत (बाक़ी) न रहेगी बल्कि वह तो ये कहेगें क़सम है उस ख़ुदा की जो हमारा पालने वाला है हम किसी को उसका शरीक नहीं बनाते थे
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अनुवाद — अल-अनआम 21

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Tuesday, August 18, 2026

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