अल-अनआम · 27/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَلَوْ تَرَىٰ إِذْ وُقِفُوا عَلَى النَّارِ فَقَالُوا يَا لَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِآيَاتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ ۝٢٧
Wa law taraaa iz wauqifoo `alan Naari faqaaloo yaa laitanaa nuraddu wa laa nukaz ziba bi Aayaati Rabbinaa wa nakoona minal mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) अगर तुम उन लोगों को उस वक्त देखते (तो ताज्जुब करते) जब जहन्नुम (के किनारे) पर लाकर खड़े किए जाओगे तो (उसे देखकर) कहेगें ऐ काश हम (दुनिया में) फिर (दुबारा) लौटा भी दिए जाते और अपने परवरदिगार की आयतों को न झुठलाते और हम मोमिनीन से होते (मगर उनकी आरज़ू पूरी न होगी)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وُقِفُوا عَلَى النَّارِ: उन्हें आग के सामने खड़ा किया जाएगा, यानी नरक की आग पर पेश किया जाएगा।
  • يَا لَيْتَنَا نُرَدُّ: काश! हमें (दुनिया में) लौटा दिया जाए।
  • وَلَا نُكَذِّبَ بِآيَاتِ رَبِّنَا: और हम अपने रब की आयतों (निशानियों) को झुठलाएँ नहीं।
  • وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ: और हम ईमान लाने वालों में से हो जाएँ।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! यदि तुम उस समय को देखो जब ये मुशरिक (बहुदेववादी) क़ियामत के दिन नरक की आग के सामने खड़े किए जाएँगे, और वे अपनी आँखों से उसके भयानक दृश्य, ज़ंजीरें, और अज़ाब के सामान देख लेंगे, तो तुम एक अत्यंत भयानक और हैरतअंगेज़ मंज़र देखोगे। उस वक़्त वे पछतावे और हसरत के साथ कहेंगे: "काश! हमें दुनिया में लौटा दिया जाता, तो हम अपने रब की आयतों को झुठलाते नहीं और ईमान लाने वालों में शामिल हो जाते।" लेकिन यह तमन्ना उनके किसी काम न आएगी, क्योंकि यह मौत के बाद और अज़ाब देखने के बाद की बात है, जब ईमान लाना बेकार है। वे दुनिया में जीवन के दौरान जो कुछ कर सकते थे, वह समय बीत चुका है, और अब यह पछतावा केवल उनके अज़ाब को बढ़ाने का कारण बनेगा।

फ़ायदे (सीख):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान और अच्छे कर्मों का समय केवल दुनिया की ज़िंदगी है। मौत के बाद पछतावा करने से कुछ हासिल नहीं होगा, इसलिए हमें हर पल का सदुपयोग करना चाहिए।
  2. अल्लाह की आयतों (क़ुरआन और कुदरत के निशानियों) को झुठलाना सबसे बड़ा नुक़सान है, और इन पर ईमान लाना ही सच्ची कामयाबी का रास्ता है।
  3. यह आयत हमें आख़िरत के अज़ाब से डराती है और बताती है कि जो लोग आज अल्लाह के हुक्मों से ग़ाफ़िल हैं, वे क़ियामत के दिन कितनी बुरी हालत में होंगे। इसलिए हमें आज ही अपनी ज़िंदगी को सुधार लेना चाहिए और अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत के दरवाज़े पर दस्तक देनी चाहिए।
  4. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि जब हमारे पास ईमान और हिदायत का मौक़ा है, तो हमें उसे गंवाना नहीं चाहिए, क्योंकि वह मौक़ा दोबारा नहीं मिलेगा। अल्लाह की रहमत और उसके दीन की तरफ़ आना ही सबसे बड़ी भलाई है।


📜 आयत 25-29 — अल-अनआम

25وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُ إِلَيْكَ ۖ وَجَعَلْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَن يَفْقَهُوهُ وَفِي آذَانِهِمْ وَقْرًا ۚ وَإِن يَرَوْا كُلَّ آيَةٍ لَّا يُؤْمِنُوا بِهَا ۚ حَتَّىٰ إِذَا جَاءُوكَ يُجَادِلُونَكَ يَقُولُ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ هَٰذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ
वह सब ग़ायब हो गयी और बाज़ उनमें के ऐसे भी हैं जो तुम्हारी (बातों की) तरफ कान लगाए रहते हैं और (उनकी हठ धर्मी इस हद को पहुँची है कि गोया हमने ख़ुद उनके दिलों पर परदे डाल दिए हैं और उनके कानों में बहरापन पैदा कर दिया है कि उसे समझ न सकें और अगर वह सारी (ख़ुदाई के) मौजिज़े भी देखे लें तब भी ईमान न लाएंगें यहाँ तक (हठ धर्मी पहुची) कि जब तुम्हारे पास तुम से उलझे हुए आ निकलते हैं तो कुफ्फ़ार (क़ुरान लेकर) कहा बैठे है (कि भला इसमें रखा ही क्या है) ये तो अगलों की कहानियों के सिवा कुछ भी नहीं
26وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْأَوْنَ عَنْهُ ۖ وَإِن يُهْلِكُونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
और ये लोग (दूसरों को भी) उस के (सुनने से) से रोकते हैं और ख़ुद तो अलग थलग रहते ही हैं और (इन बातों से) बस आप ही अपने को हलाक करते हैं और (अफसोस) समझते नहीं
27وَلَوْ تَرَىٰ إِذْ وُقِفُوا عَلَى النَّارِ فَقَالُوا يَا لَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِآيَاتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
(ऐ रसूल) अगर तुम उन लोगों को उस वक्त देखते (तो ताज्जुब करते) जब जहन्नुम (के किनारे) पर लाकर खड़े किए जाओगे तो (उसे देखकर) कहेगें ऐ काश हम (दुनिया में) फिर (दुबारा) लौटा भी दिए जाते और अपने परवरदिगार की आयतों को न झुठलाते और हम मोमिनीन से होते (मगर उनकी आरज़ू पूरी न होगी)
28بَلْ بَدَا لَهُم مَّا كَانُوا يُخْفُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَلَوْ رُدُّوا لَعَادُوا لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَإِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
बल्कि जो (बेईमानी) पहले से छिपाते थे आज (उसकी हक़ीक़त) उन पर खुल गयी और (हम जानते हैं कि) अगर ये लोग (दुनिया में) लौटा भी दिए जाएं तो भी जिस चीज़ की मनाही की गयी है उसे करें और ज़रुर करें और इसमें शक़ नहीं कि ये लोग ज़रुर झूठे हैं
29وَقَالُوا إِنْ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ
और कुफ्फार ये भी तो कहते हैं कि हमारी इस दुनिया ज़िन्दगी के सिवा कुछ भी नहीं और (क़यामत वग़ैरह सब ढकोसला है) हम (मरने के बाद) भी उठाए ही न जायेंगे
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अनुवाद — अल-अनआम 27

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Tuesday, August 18, 2026

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