अल-आराफ · 63/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
أَوَعَجِبْتُمْ أَن جَاءَكُمْ ذِكْرٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنكُمْ لِيُنذِرَكُمْ وَلِتَتَّقُوا وَلَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ۝٦٣
awa`ajibtum an jaaa`akum zikrum mir Rabbikum `alaa rajulim minkum liyunzirakum wa litattaqoo wa la`allakum turhamoon
📖 हिंदी अर्थ
क्या तुम्हें उस बात पर ताअज्जुब है कि तुम्हारे पास तुम्ही में से एक मर्द (आदमी) के ज़रिए से तुम्हारे परवरदिगार का ज़िक्र (हुक्म) आया है ताकि वह तुम्हें (अज़ाब से) डराए और ताकि तुम परहेज़गार बनों और ताकि तुम पर रहम किया जाए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذِكْرٌ: नसीहत, वह वचन जो याद दिलाए।
  • عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنكُمْ: तुम्हारे ही एक आदमी (नबी) के ज़रिए।
  • لِيُنذِرَكُمْ: ताकि वह तुम्हें (अल्लाह के अज़ाब से) डराए।
  • وَلِتَتَّقُوا: और ताकि तुम (अल्लाह से) डरो (तक़्वा अपनाओ)।
  • تُرْحَمُونَ: तुम पर रहम किया जाए।

तफ़सीर (व्याख्या):

क्या तुम्हें इस बात पर अचरज हुआ कि तुम्हारे रब की तरफ से तुम्हारे पास नसीहत और याद दिलाने वाली चीज़ (क़ुरआन) तुम्हारे ही एक आदमी के ज़रिए आई, जिसकी नस्ल, सच्चाई और अमानतदारी को तुम ख़ुद जानते हो? वह कोई अजनबी या दूसरी क़ौम का नहीं, बल्कि तुम्हीं में से उठा है। उसका मक़सद यह है कि वह तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से डराए, अगर तुम कुफ़्र और नाफ़रमानी पर डटे रहे। साथ ही वह तुम्हें तक़्वा (परहेज़गारी) की तरफ बुलाए—यानी अल्लाह के हुक्मों की पैरवी करो और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचो—ताकि तुम पर रहम किया जाए। यह रहम दुनिया में हिदायत की शक्ल में और आख़िरत में जन्नत की शक्ल में मिलेगा। यह कोई अजीब बात नहीं कि अल्लाह किसी इंसान को अपना पैग़ाम देने के लिए चुने, बल्कि यह अल्लाह की रहमत है कि उसने तुम्हारे बीच से ही एक सच्चा और भरोसेमंद रसूल भेजा, ताकि तुम्हारे लिए समझना आसान हो और हुज्जत क़ायम हो जाए।


फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह की रहमत का तक़ाज़ा है कि वह हर क़ौम में उन्हीं की ज़बान और उन्हीं के माहौल से रसूल भेजे, ताकि लोग आसानी से समझ सकें। यह अल्लाह का इंसाफ़ और मेहरबानी है।
  2. नबी का इंसान होना कोई ऐब नहीं, बल्कि रहमत है—क्योंकि लोग उनसे सीधे सीख सकते हैं, उनकी ज़िंदगी को देख सकते हैं और उन पर ईमान ला सकते हैं।
  3. नसीहत और डराने (तरहीब) का मक़सद लोगों को अल्लाह की तरफ लाना है, न कि उन्हें निराश करना। डर के साथ उम्मीद भी है—"ताकि तुम पर रहम किया जाए"।
  4. तक़्वा (अल्लाह से डरना) ही वह रास्ता है जो इंसान को अल्लाह की रहमत तक पहुँचाता है। जो जितना परहेज़गार, उतना ही अल्लाह के करीब।
  5. अचरज और हैरत में पड़ने के बजाय, इंसान को चाहिए कि जब सच्चाई उसके सामने आए तो उसे क़बूल करे। नबी की सच्चाई और अमानत उनकी सबसे बड़ी दलील है।
  6. यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों को भलाई की तरफ बुलाते वक़्त नरमी, हिकमत और उनकी समझ के अनुसार बात करनी चाहिए, और साथ ही उन्हें अल्लाह की रहमत की उम्मीद भी दिलानी चाहिए।


📜 आयत 61-65 — अल-आराफ

61قَالَ يَا قَوْمِ لَيْسَ بِي ضَلَالَةٌ وَلَٰكِنِّي رَسُولٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ
तब नूह ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम मुझ में गुमराही (वग़ैरह) तो कुछ नहीं बल्कि मैं तो परवरदिगारे आलम की तरफ से रसूल हूँ
62أُبَلِّغُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَأَنصَحُ لَكُمْ وَأَعْلَمُ مِنَ اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
तुम तक अपने परवरदिगार के पैग़ामात पहुचाएं देता हूँ और तुम्हारे लिए तुम्हारी ख़ैर ख्वाही करता हूँ और ख़ुदा की तरफ से जो बातें मै जानता हूँ तुम नहीं जानते
63أَوَعَجِبْتُمْ أَن جَاءَكُمْ ذِكْرٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنكُمْ لِيُنذِرَكُمْ وَلِتَتَّقُوا وَلَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
क्या तुम्हें उस बात पर ताअज्जुब है कि तुम्हारे पास तुम्ही में से एक मर्द (आदमी) के ज़रिए से तुम्हारे परवरदिगार का ज़िक्र (हुक्म) आया है ताकि वह तुम्हें (अज़ाब से) डराए और ताकि तुम परहेज़गार बनों और ताकि तुम पर रहम किया जाए
64فَكَذَّبُوهُ فَأَنجَيْنَاهُ وَالَّذِينَ مَعَهُ فِي الْفُلْكِ وَأَغْرَقْنَا الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا عَمِينَ
इस पर भी लोगों ने उनकों झुठला दिया तब हमने उनको और जो लोग उनके साथ कश्ती में थे बचा लिया और बाक़ी जितने लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया था सबको डुबो मारा ये सब के सब यक़ीनन अन्धे लोग थे
65۞ وَإِلَىٰ عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۚ أَفَلَا تَتَّقُونَ
और (हमने) क़ौम आद की तरफ उनके भाई हूद को (रसूल बनाकर भेजा) तो उन्होनें लोगों से कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की इबादत करो उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं तो क्या तुम (ख़ुदा से) डरते नहीं हो
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अनुवाद — अल-आराफ 63

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Wednesday, August 19, 2026

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