अल-आराफ · 70/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
قَالُوا أَجِئْتَنَا لِنَعْبُدَ اللَّهَ وَحْدَهُ وَنَذَرَ مَا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُنَا ۖ فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ ۝٧٠
Qaalooo aji`tanaa lina`budal laaha wahdahoo wa nazara maa kaana ya`budu aabaaa`u naa faatinaa bimaa ta`idunaaa in kunta minas saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
तो वह लोग कहने लगे क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि सिर्फ ख़ुदा की तो इबादत करें और जिनको हमारे बाप दादा पूजते चले आए छोड़ बैठें पस अगर तुम सच्चे हो तो जिससे तुम हमको डराते हो हमारे पास लाओ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَجِئْتَنَا: क्या तू हमारे पास आया है?
  • نَذَرَ: हम छोड़ दें।
  • آبَاؤُنَا: हमारे बाप-दादा।
  • فَأْتِنَا: तो हमारे पास ले आ।
  • بِمَا تَعِدُنَا: उस चीज़ को जिसकी तू हमें धमकी देता है (अर्थात अज़ाब)।
  • الصَّادِقِينَ: सच बोलने वालों में से।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम 'आद' को अल्लाह की इबादत की दावत दी और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराया, तो उनकी क़ौम ने अहंकार और उपहास के साथ जवाब दिया। उन्होंने कहा: "ऐ हूद! क्या तू इसलिए हमारे पास आया है कि हम सिर्फ़ अकेले अल्लाह की इबादत करें और उन माबूदों को छोड़ दें जिनकी हमारे बाप-दादा इबादत करते आए हैं? यह बात हमें कतई मंज़ूर नहीं। और अगर तू सच्चा है, तो जिस अज़ाब की तू हमें धमकी देता है, उसे हमारे ऊपर ले आ।"

यह जवाब उनके हठधर्मी, अंधी परंपरा की पैरवी और नबी के मुक़ाबले में उपहास का स्पष्ट प्रमाण था। उन्होंने न तो दलील सुनी, न सोच-विचार किया, बल्कि सिर्फ़ इसलिए सच को ठुकरा दिया क्योंकि यह उनके पूर्वजों के रास्ते के ख़िलाफ़ था। उन्होंने अज़ाब की जल्दी माँगी, जो उनके अविश्वास और अकड़ की आख़िरी मंज़िल थी।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. अंधी परंपरा की पैरवी इंसान को हक़ से दूर कर देती है — सिर्फ़ इसलिए कि बाप-दादा ने कुछ किया, उसे सही मान लेना और दलील को नज़रअंदाज़ कर देना, हिदायत से महरूम होने का सबसे बड़ा कारण है।
  2. नबियों के साथ उपहास करना किसी क़ौम के लिए हलाकत का ज़रिया बनता है — जब इंसान सच्चे दावत देने वाले का मज़ाक उड़ाता है, तो वह अपने लिए रहमत के दरवाज़े बंद कर लेता है और अज़ाब का सामान करता है।
  3. अज़ाब की जल्दी माँगना बुरा अंजाम देता है — क़ौमों ने जब नबियों से अज़ाब की जल्दी माँगी, तो अल्लाह का अज़ाब उन पर ऐसे आया कि उन्हें मौका-ए-तौबा भी न मिला। मुसलमान को चाहिए कि वह अल्लाह की रहमत की तरफ़ दौड़े, अज़ाब की तरफ़ नहीं।
  4. तौहीद (अल्लाह की एकता) हर नबी की दावत का केंद्र बिंदु है — हज़रत हूद से लेकर हमारे नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तक, हर नबी ने सबसे पहले यही पुकारा कि अल्लाह को अकेला मानो और उसके सिवा किसी की इबादत मत करो। यही इंसान की कामयाबी और निजात की कुंजी है।


📜 आयत 68-72 — अल-आराफ

68أُبَلِّغُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَأَنَا لَكُمْ نَاصِحٌ أَمِينٌ
मैं तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार के पैग़ामात पहँचाए देता हूँ और मैं तुम्हारा सच्चा ख़ैरख्वाह हूँ
69أَوَعَجِبْتُمْ أَن جَاءَكُمْ ذِكْرٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنكُمْ لِيُنذِرَكُمْ ۚ وَاذْكُرُوا إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَاءَ مِن بَعْدِ قَوْمِ نُوحٍ وَزَادَكُمْ فِي الْخَلْقِ بَسْطَةً ۖ فَاذْكُرُوا آلَاءَ اللَّهِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
क्या तुम्हें इस पर ताअज्जुब है कि तुम्हारे परवरदिगार का हुक्म तुम्हारे पास तुम्ही में एक मर्द (आदमी) के ज़रिए से (आया) कि तुम्हें (अजाब से) डराए और (वह वक्त) याद करो जब उसने तुमको क़ौम नूह के बाद ख़लीफा (व जानशीन) बनाया और तुम्हारी ख़िलाफ़त में भी बहुत ज्यादती कर दी तो ख़ुदा की नेअमतों को याद करो ताकि तुम दिली मुरादे पाओ
70قَالُوا أَجِئْتَنَا لِنَعْبُدَ اللَّهَ وَحْدَهُ وَنَذَرَ مَا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُنَا ۖ فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
तो वह लोग कहने लगे क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि सिर्फ ख़ुदा की तो इबादत करें और जिनको हमारे बाप दादा पूजते चले आए छोड़ बैठें पस अगर तुम सच्चे हो तो जिससे तुम हमको डराते हो हमारे पास लाओ
71قَالَ قَدْ وَقَعَ عَلَيْكُم مِّن رَّبِّكُمْ رِجْسٌ وَغَضَبٌ ۖ أَتُجَادِلُونَنِي فِي أَسْمَاءٍ سَمَّيْتُمُوهَا أَنتُمْ وَآبَاؤُكُم مَّا نَزَّلَ اللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَانٍ ۚ فَانتَظِرُوا إِنِّي مَعَكُم مِّنَ الْمُنتَظِرِينَ
हूद ने जवाब दिया (कि बस समझ लो) कि तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर अज़ाब और ग़ज़ब नाज़िल हो चुका क्या तुम मुझसे चन्द (बुतो के फर्ज़ी) नामों के बारे में झगड़ते हो जिनको तुमने और तुम्हारे बाप दादाओं ने (ख्वाहमख्वाह) गढ़ लिए हैं हालाकि ख़ुदा ने उनके लिए कोई सनद नहीं नाज़िल की पस तुम ( अज़ाबे ख़ुदा का) इन्तज़ार करो मैं भी तुम्हारे साथ मुन्तिज़र हूँ
72فَأَنجَيْنَاهُ وَالَّذِينَ مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِّنَّا وَقَطَعْنَا دَابِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۖ وَمَا كَانُوا مُؤْمِنِينَ
आख़िर हमने उनको और जो लोग उनके साथ थे उनको अपनी रहमत से नजात दी और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया था हमने उनकी जड़ काट दी और वह लोग ईमान लाने वाले थे भी नहीं
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अनुवाद — अल-आराफ 70

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Tuesday, August 18, 2026

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