अल-आराफ · 80/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِّنَ الْعَالَمِينَ ۝٨٠
Wa Lootan iz qaala liqawmiheee ataatoonal faahishata maa sabaqakum bihaa min ahadim minal `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
और (लूत को हमने रसूल बनाकर भेजा था) जब उन्होनें अपनी क़ौम से कहा कि (अफसोस) तुम ऐसी बदकारी (अग़लाम) करते हो कि तुमसे पहले सारी ख़ुदाई में किसी ने ऐसी बदकारी नहीं की थी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْفَاحِشَةَ: वह अत्यंत घृणित और गंभीर बुराई जो सीमा से बाहर हो।
  • مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍ: इस कार्य में तुमसे पहले कोई नहीं हुआ।

व्याख्या:

और ऐ नबी! आप लूत (अलैहिस्सलाम) का वह समय याद करें जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा — और यह कहना उनकी ओर से निंदा और फटकार के रूप में था — कि क्या तुम वह अत्यंत घिनौना कार्य करते हो जो बुराई की पराकाष्ठा है? यानी पुरुषों का पुरुषों के पास जाना। यह वह कर्म है जिसे तुमने स्वयं ईजाद किया और इसे करने में तुमसे पहले सारे संसार में से कोई भी व्यक्ति नहीं गुज़रा। यह इतना घृणित कार्य था कि अल्लाह ने इसे "फ़ाहिशा" (अश्लील कर्म) कहा, और यह शैतान की सीख थी जिसे उसने उन्हें सिखाया था। लूत (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें इस बुराई से रोकने के लिए यह बात कही, क्योंकि यह कार्य प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध था और अल्लाह की सज़ा का कारण बना।

शिक्षाएँ और लाभ:

  • इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि नबियों का काम अपनी उम्मत को बुराई से रोकना और उन्हें सीधे मार्ग पर लाना है, चाहे लोग कितने भी जिद्दी क्यों न हों।
  • यह आयत उन सभी कार्यों की गंभीरता को दर्शाती है जो मानव स्वभाव के विरुद्ध हैं, और यह कि अल्लाह ऐसे कार्यों से नाराज़ होता है।
  • इससे यह भी पता चलता है कि इस्लाम पवित्रता, शालीनता और स्वच्छता का धर्म है, और यह हर उस चीज़ से दूर रहने का आदेश देता है जो समाज को भ्रष्ट करती है।
  • यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि बुराई को रोकने में निडरता से बात करनी चाहिए, भले ही बात करने वाला अकेला क्यों न हो।


📜 आयत 78-82 — सूरा अल-आराफ

78فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ
तब उन्हें ज़लज़ले ने ले डाला और वह लोग ज़ानू पर सर किए (जिस तरह) बैठे थे बैठे के बैठे रह गए
79فَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَةَ رَبِّي وَنَصَحْتُ لَكُمْ وَلَٰكِن لَّا تُحِبُّونَ النَّاصِحِينَ
उसके बाद सालेह उनसे टल गए और (उनसे मुख़ातिब होकर) कहा मेरी क़ौम (आह) मैनें तो अपने परवरदिगार के पैग़ाम तुम तक पहुचा दिए थे और तुम्हारे ख़ैरख्वाही की थी (और ऊँच नीच समझा दिया था) मगर अफसोस तुम (ख़ैरख्वाह) समझाने वालों को अपना दोस्त ही नहीं समझते
80وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِّنَ الْعَالَمِينَ
और (लूत को हमने रसूल बनाकर भेजा था) जब उन्होनें अपनी क़ौम से कहा कि (अफसोस) तुम ऐसी बदकारी (अग़लाम) करते हो कि तुमसे पहले सारी ख़ुदाई में किसी ने ऐसी बदकारी नहीं की थी
81إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِّن دُونِ النِّسَاءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ مُّسْرِفُونَ
हाँ तुम औरतों को छोड़कर शहवत परस्ती के वास्ते मर्दों की तरफ माएल होते हो (हालाकि उसकी ज़रूरत नहीं) मगर तुम लोग कुछ हो ही बेहूदा
82وَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِ إِلَّا أَن قَالُوا أَخْرِجُوهُم مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ
सिर्फ करनें वालों (को नुत्फे को ज़ाए करते हो उस पर उसकी क़ौम का उसके सिवा और कुछ जवाब नहीं था कि वह आपस में कहने लगे कि उन लोगों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो क्योंकि ये तो वह लोग हैं जो पाक साफ बनना चाहते हैं)
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
80आयत

अनुवाद — अल-आराफ 80

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Wednesday, September 30, 2026

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