अल-अनफाल · 25/75
अनुवाद उच्चारण — अल-अनफाल
وَاتَّقُوا فِتْنَةً لَّا تُصِيبَنَّ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنكُمْ خَاصَّةً ۖ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ ۝٢٥
Wattaqoo fitnatal laa tuseebannal lazeena zalamoo minkum khaaaassatanw wa`lamooo annal laaha shadeedul `iqaab
📖 हिंदी अर्थ
और उस फितने से डरते रहो जो ख़ास उन्हीं लोगों पर नही पड़ेगा जिन्होने तुम में से ज़ुल्म किया (बल्कि तुम सबके सब उसमें पड़ जाओगे) और यक़ीन मानों कि ख़ुदा बड़ा सख्त अज़ाब करने वाला है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • फ़ित्ना: परीक्षा, आज़माइश, या अज़ाब (दंड)।
  • ला तुसीबन्नल्लज़ीना ज़लमू: यह अज़ाब सिर्फ़ उन्हीं तक सीमित नहीं रहेगा जिन्होंने ज़ुल्म किया।
  • शदीदुल इक़ाब: सख्त सज़ा देने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालों! उस फ़ित्ने (परीक्षा और अज़ाब) से डरो जो सिर्फ़ उन्हीं लोगों तक सीमित नहीं रहती जिन्होंने ज़ुल्म और गुनाह किए हैं, बल्कि जब समाज में ज़ुल्म फैल जाता है और अच्छे लोग उसे रोकने की कोशिश नहीं करते, तो उसका अज़ाब सबको अपनी चपेट में ले लेता है—चाहे वे नेक हों या गुनाहगार। यह अल्लाह का क़ानून है कि जब बुराई आम हो जाए और उसे रोकने वाला कोई न हो, तो उसकी सज़ा पूरे समाज पर आती है।

याद रखो कि अल्लाह तआला बहुत सख्त सज़ा देने वाला है। उसका अज़ाब किसी को नहीं बख़्शता जब वह नाज़िल हो जाता है। इसलिए सिर्फ़ अपनी निजी नेकी पर भरोसा मत करो, बल्कि समाज में बुराई के खिलाफ़ आवाज़ उठाओ, ज़ुल्म को रोकने की कोशिश करो, और अल्लाह के हुक्मों की पूरी तरह पालना करो।

यह आयत हमें सिखाती है कि एक मुसलमान सिर्फ़ अपने बारे में नहीं सोचता, बल्कि पूरे समाज की ज़िम्मेदारी महसूस करता है। जब हम किसी को ज़ुल्म करते देखें और चुप रहें, तो समझो कि हम भी उस गुनाह में शरीक हैं। अल्लाह की रहमत और उसकी पनाह हासिल करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि हम नेकी का हुक्म दें और बुराई से रोकें, ताकि अल्लाह का अज़ाब हमसे दूर रहे और हम उसकी रहमत के साये में ज़िंदगी गुज़ारें।

🎧 सुनें

📜 आयत 23-27 — अल-अनफाल

23وَلَوْ عَلِمَ اللَّهُ فِيهِمْ خَيْرًا لَّأَسْمَعَهُمْ ۖ وَلَوْ أَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوا وَّهُم مُّعْرِضُونَ
और अगर ख़ुदा उनमें नेकी (की बू भी) देखता तो ज़रूर उनमें सुनने की क़ाबलियत अता करता मगर ये ऐसे हैं कि अगर उनमें सुनने की क़ाबिलयत भी देता तो मुँह फेर कर भागते।
24يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَجِيبُوا لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيكُمْ ۖ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَحُولُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِهِ وَأَنَّهُ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
ऐ ईमानदार जब तुम को हमारा रसूल (मोहम्मद) ऐसे काम के लिए बुलाए जो तुम्हारी रूहानी ज़िन्दगी का बाइस हो तो तुम ख़ुदा और रसूल के हुक्म दिल से कुबूल कर लो और जान लो कि ख़ुदा वह क़ादिर मुतलिक़ है कि आदमी और उसके दिल (इरादे) के दरमियान इस तरह आ जाता है और ये भी समझ लो कि तुम सबके सब उसके सामने हाज़िर किये जाओगे
25وَاتَّقُوا فِتْنَةً لَّا تُصِيبَنَّ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنكُمْ خَاصَّةً ۖ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
और उस फितने से डरते रहो जो ख़ास उन्हीं लोगों पर नही पड़ेगा जिन्होने तुम में से ज़ुल्म किया (बल्कि तुम सबके सब उसमें पड़ जाओगे) और यक़ीन मानों कि ख़ुदा बड़ा सख्त अज़ाब करने वाला है
26وَاذْكُرُوا إِذْ أَنتُمْ قَلِيلٌ مُّسْتَضْعَفُونَ فِي الْأَرْضِ تَخَافُونَ أَن يَتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ فَآوَاكُمْ وَأَيَّدَكُم بِنَصْرِهِ وَرَزَقَكُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
(मुसलमानों वह वक्त याद करो) जब तुम सर ज़मीन (मक्के) में बहुत कम और बिल्कुल बेबस थे उससे सहमे जाते थे कि कहीं लोग तुमको उचक न ले जाए तो ख़ुदा ने तुमको (मदीने में) पनाह दी और ख़ास अपनी मदद से तुम्हारी ताईद की और तुम्हे पाक व पाकीज़ा चीज़े खाने को दी ताकि तुम शुक्र गुज़ारी करो
27يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَخُونُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ وَتَخُونُوا أَمَانَاتِكُمْ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
ऐ ईमानदारों न तो ख़ुदा और रसूल की (अमानत में) ख्यानत करो और न अपनी अमानतों में ख्यानत करो हालॉकि समझते बूझते हो
अल-अनफालकुरान सूची
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25आयत

अनुवाद — अल-अनफाल 25

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Tuesday, August 18, 2026

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