अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- تُحِبُّونَ الْمَالَ – तुम धन से प्रेम करते हो
- حُبًّا جَمًّا – अत्यधिक प्रेम, बहुत अधिक लगाव
व्याख्या:
इस आयत में अल्लाह तआला मनुष्य की उस बुरी आदत की ओर इशारा कर रहे हैं जो उसे हलाकत की ओर ले जाती है। इंसान धन-दौलत से इतना अधिक प्रेम करता है कि वह उसे अल्लाह के मार्ग में खर्च नहीं करता, न ही उससे अल्लाह का हक़ अदा करता है। यह प्रेम इतना गहरा और बेहद होता है कि इंसान अपने रब की याद को भूल जाता है, अपने भाई-बहनों के हक़ों को भूल जाता है, और केवल धन इकट्ठा करने में ही अपनी ज़िंदगी गुज़ार देता है।
यह आयत उन लोगों के बारे में है जो धन को अपना सब कुछ मान लेते हैं। वे सोचते हैं कि धन ही सुख-शांति का ज़रिया है, जबकि असली सुख अल्लाह की इबादत में और उसके बताए रास्ते पर चलने में है। जब इंसान धन से इतना अधिक प्रेम करता है, तो वह कंजूस बन जाता है, दूसरों की मदद नहीं करता, यतीमों और मिस्कीनों के हक़ नहीं देता, और न ही दूसरों को भलाई की तरफ प्रोत्साहित करता है।
अल्लाह तआला हमें सिखा रहे हैं कि धन से प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन यह प्रेम अत्यधिक और हद से बढ़ा हुआ नहीं होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि धन तो अल्लाह की दी हुई अमानत है, और हमें उसमें से अल्लाह का हक़, गरीबों का हक़ और ज़रूरतमंदों का हक़ अदा करना है। जो लोग धन को ही सब कुछ मान लेते हैं, वे आख़िरत में बहुत पछताएंगे।
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हम अपने दिलों को धन के मोह से पाक रखें, और याद रखें कि असली दौलत तो अल्लाह की रज़ा है। जो व्यक्ति अल्लाह के मार्ग में खर्च करता है, अल्लाह उसे कभी कमी में नहीं डालता, बल्कि उसकी रोज़ी में बरकत देता है। हमें चाहिए कि हम अपने धन को अल्लाह की राह में खर्च करें, गरीबों की मदद करें, और यतीमों के साथ अच्छा व्यवहार करें, ताकि हम दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हों।
📜 आयत 18-22 — अल-फज्र
अनुवाद — अल-फज्र 20
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पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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