अल-आदियात · 6/11
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आदियात
إِنَّ الْإِنسَانَ لِرَبِّهِ لَكَنُودٌ ۝٦
Innal-insana lirabbihee lakanood
📖 हिंदी अर्थ
(ग़रज़ क़सम है) कि बेशक इन्सान अपने परवरदिगार का नाशुक्रा है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • कनूद का अर्थ है अत्यधिक कृतघ्न, नाशुक्रा, जो भलाई को न पहचाने और नेमतों का इनकार करे।

तफसीर:

अल्लाह तआला इस आयत में इंसान की एक बड़ी कमज़ोरी और खामी को बयान कर रहे हैं। इंसान अपने रब की नेमतों के प्रति बहुत नाशुक्रा है। वह अल्लाह की अनगिनत देनों को भूल जाता है और उन्हें ज़ाहिर नहीं करता। जब उस पर मुसीबत आती है तो वह घबरा जाता है और जब खैर व राहत मिलती है तो वह रोक लेता है, यानी अल्लाह की राह में खर्च नहीं करता। यह कृतघ्नता इंसान की फितरत में शामिल है, जब तक कि अल्लाह उसे हिदायत न दे और उसके दिल को नूर से न भर दे।

इंसान अपने रब की नेमतों का इनकार करता है, और यह इनकार उसके अंदर इतना गहरा होता है कि वह खुद भी इस बात का गवाह होता है। वह माल की मुहब्बत में इतना डूबा होता है कि उसे अल्लाह की नेमतें याद नहीं रहतीं। यही वजह है कि वह अल्लाह के हुक्मों को भूलकर अपनी ख्वाहिशों के पीछे भागता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें आत्म-निरीक्षण की दावत देती है। क्या हम सचमुच अल्लाह के शुक्रगुज़ार हैं? क्या हम अपनी ज़ुबान से, अपने दिल से और अपने आमाल से अल्लाह की नेमतों का एतराफ़ करते हैं? यह आयत हमें सिखाती है कि शुक्र अदा करना सिर्फ़ ज़ुबान से "अल्हम्दुलिल्लाह" कहना नहीं है, बल्कि अल्लाह की नेमतों को उसकी राह में खर्च करना, उसके हुक्मों पर अमल करना और उसकी मख़लूक़ के साथ भलाई करना भी शुक्र का हिस्सा है।

अल्लाह तआला हमें इस कृतघ्नता से बचाए और हमें शुक्रगुज़ार बंदे बनाए। हमें चाहिए कि हर पल अल्लाह की नेमतों को याद करें और उसका शुक्र अदा करें, क्योंकि शुक्र अदा करने से अल्लाह नेमतों में और इज़ाफ़ा करता है। जो शुक्रगुज़ार होता है, अल्लाह उसे और देता है, और जो नाशुक्रा होता है, वह अल्लाह के अज़ाब का हक़दार बनता है।



📜 आयत 4-8 — सूरा अल-आदियात

4فَأَثَرْنَ بِهِ نَقْعًا
(तो दौड़ धूप से) बुलन्द कर देते हैं
5فَوَسَطْنَ بِهِ جَمْعًا
फिर उस वक्त (दुश्मन के) दिल में घुस जाते हैं
6إِنَّ الْإِنسَانَ لِرَبِّهِ لَكَنُودٌ
(ग़रज़ क़सम है) कि बेशक इन्सान अपने परवरदिगार का नाशुक्रा है
7وَإِنَّهُ عَلَىٰ ذَٰلِكَ لَشَهِيدٌ
और यक़ीनी ख़ुदा भी उससे वाक़िफ़ है
8وَإِنَّهُ لِحُبِّ الْخَيْرِ لَشَدِيدٌ
और बेशक वह माल का सख्त हरीस है
अल-आदियातकुरान सूची
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मक्कीअवतरण स्थान
6आयत

अनुवाद — अल-आदियात 6

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Friday, October 2, 2026

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