यूसुफ · 14/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
قَالُوا لَئِنْ أَكَلَهُ الذِّئْبُ وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّا إِذًا لَّخَاسِرُونَ ۝١٤
Qaaloo la in akalahuzzi`bu wa nahnu `usbatun innaaa izal lakhaasiroon
📖 हिंदी अर्थ
वह लोग कहने लगे जब हमारी बड़ी जमाअत है (इस पर भी) अगर उसको भेड़िया खा जाए तो हम लोग यक़ीनन बड़े घाटा उठाने वाले (निकलते) ठहरेगें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عُصْبَةٌ (उस्बतुन): मज़बूत और संगठित समूह, जो किसी की रक्षा करने की क्षमता रखता हो।
  • لَخَاسِرُونَ (ल-ख़ासिरून): घाटे में रहने वाले, नुक़सान उठाने वाले, बेकार और नाकारा लोग।

आयत की व्याख्या:

जब हज़रत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटों से कहा कि मुझे डर है कि कहीं यूसुफ़ को भेड़िया न खा जाए, और तुम लोग उससे बेख़बर न हो जाओ, तो उन्होंने जवाब में यह बात कही। उन्होंने कहा: "अगर भेड़िया उसे खा जाए जबकि हम एक मज़बूत और ताकतवर समूह हैं, तो हम सचमुच बड़े घाटे में रहेंगे और हमारी कोई हैसियत नहीं।" उनका इशारा इस ओर था कि हम इतने सारे लोग हैं, इतने ताकतवर हैं कि अगर हमारी मौजूदगी में भेड़िया उसे खा जाए, तो हमारी कोई अहमियत नहीं, हम निहायत कमज़ोर और नाकारा हैं। उन्होंने यह बात अपने पिता को आश्वस्त करने के लिए कही, ताकि वह उन्हें यूसुफ़ को साथ ले जाने की इजाज़त दे दें। लेकिन उनकी यह बात उनके दिल में छिपे बुरे इरादे को छिपाने का एक हथियार थी, क्योंकि असल में वे यूसुफ़ को नुक़सान पहुँचाने की योजना बना चुके थे। उन्होंने अपनी बात को इस तरह पेश किया जैसे वे यूसुफ़ की हिफ़ाज़त के लिए बहुत चिंतित हैं, जबकि उनका इरादा उसे कुएँ में डालने का था।

आयत से मिलने वाली शिक्षाएँ और फ़ायदे:

  1. इंसान को चाहिए कि वह अपनी बातों में सच्चाई और ईमानदारी अपनाए। यूसुफ़ के भाइयों ने अपने पिता को धोखा देने के लिए मीठी-मीठी बातें कीं, जो कि बिल्कुल ग़लत था। इससे हमें सबक मिलता है कि झूठ और धोखा कभी भी अच्छे अंजाम तक नहीं पहुँचाता।
  2. इंसान को अपनी ताकत और हैसियत पर घमंड नहीं करना चाहिए। भाइयों ने अपनी ताकत का दावा किया, लेकिन अल्लाह की योजना के आगे उनकी सारी ताकत बेकार साबित हुई। यह सिखाता है कि असली ताकत अल्लाह के हाथ में है।
  3. माता-पिता की चिंता और उनकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए। हज़रत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) का डर सही निकला, इसलिए बच्चों को चाहिए कि वे अपने माता-पिता के अनुभव और उनकी सलाह को कभी हल्के में न लें।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को अपने कामों में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि इंसान की योजनाएँ चाहे कितनी भी मज़बूत हों, अल्लाह की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं हो सकता। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की कहानी का यह हिस्सा हमें यही सबक देता है कि अल्लाह की तदबीर सबसे बेहतर होती है।


📜 आयत 12-16 — यूसुफ

12أَرْسِلْهُ مَعَنَا غَدًا يَرْتَعْ وَيَلْعَبْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ
हालॉकि हम लोग तो उसके ख़ैर ख्वाह (भला चाहने वाले) हैं आप उसको कुल हमारे साथ भेज दीजिए कि ज़रा (जंगल) से फल वगैरह् खाए और खेले कूदे
13قَالَ إِنِّي لَيَحْزُنُنِي أَن تَذْهَبُوا بِهِ وَأَخَافُ أَن يَأْكُلَهُ الذِّئْبُ وَأَنتُمْ عَنْهُ غَافِلُونَ
और हम लोग तो उसके निगेहबान हैं ही याक़ूब ने कहा तुम्हारा उसको ले जाना मुझे सख्त सदमा पहुँचाना है और मै तो इससे डरता हूँ कि तुम सब के सब उससे बेख़बर हो जाओ और (मुबादा) उसे भेड़िया फाड़ खाए
14قَالُوا لَئِنْ أَكَلَهُ الذِّئْبُ وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّا إِذًا لَّخَاسِرُونَ
वह लोग कहने लगे जब हमारी बड़ी जमाअत है (इस पर भी) अगर उसको भेड़िया खा जाए तो हम लोग यक़ीनन बड़े घाटा उठाने वाले (निकलते) ठहरेगें
15فَلَمَّا ذَهَبُوا بِهِ وَأَجْمَعُوا أَن يَجْعَلُوهُ فِي غَيَابَتِ الْجُبِّ ۚ وَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِ لَتُنَبِّئَنَّهُم بِأَمْرِهِمْ هَٰذَا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
ग़रज़ यूसुफ को जब ये लोग ले गए और इस पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया कि उसको अन्धे कुएँ में डाल दें और (आख़िर ये लोग गुज़रे तो) हमने युसुफ़ के पास 'वही' भेजी कि तुम घबराओ नहीं हम अनक़रीब तुम्हें मरतबे (उँचे मकाम) पर पहुँचाएगे (तब तुम) उनके उस फेल (बद) से तम्बीह (आग़ाह) करोगे
16وَجَاءُوا أَبَاهُمْ عِشَاءً يَبْكُونَ
जब उन्हें कुछ ध्यान भी न होगा और ये लोग रात को अपने बाप के पास (बनवट) से रोते पीटते हुए आए
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अनुवाद — यूसुफ 14

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Tuesday, August 18, 2026

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