यूसुफ · 16/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
وَجَاءُوا أَبَاهُمْ عِشَاءً يَبْكُونَ ۝١٦
Wa jaaa`ooo abaahum `ishaaa `any yabkoon
📖 हिंदी अर्थ
जब उन्हें कुछ ध्यान भी न होगा और ये लोग रात को अपने बाप के पास (बनवट) से रोते पीटते हुए आए
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عِشَاءً: रात की शुरुआत का समय, सूर्यास्त के बाद का वक्त।
  • يَبْكُونَ: वे रो रहे थे (दिखावे के लिए रोना, असली गम नहीं)।

विस्तृत व्याख्या:

यह आयत हज़रत यूसुफ (अलैहिस्सलाम) के उन भाइयों का ज़िक्र करती है, जिन्होंने अपने छोटे भाई को कुएँ में डाल दिया था। शाम के समय, जब अंधेरा छाने लगा था, वे सभी भाई अपने पिता हज़रत याकूब (अलैहिस्सलाम) के पास पहुँचे। वे रो रहे थे, लेकिन यह रोना असली नहीं था, बल्कि दिखावे का था। उन्होंने रात का समय इसलिए चुना ताकि अंधेरे में उनके चेहरे के भाव और उनकी आँखों की सच्चाई छिपी रहे। उनका मकसद था कि इस तरह रो-धोकर अपने पिता को धोखा दें और अपने किए हुए काम को छिपाएँ। वे चाहते थे कि पिता उनकी बातों पर यकीन कर लें, क्योंकि रात के समय इंसान ज़्यादा भावुक हो जाता है और उस पर दिखावटी बातों का असर जल्दी होता है। यह उनकी चालाकी और मक्कारी का सबूत था कि उन्होंने झूठ बोलने के लिए ऐसा वक्त चुना जब उनके पिता उनकी बात आसानी से मान लें।

फ़ायदे और सबक:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि झूठ और धोखा कितना बुरा है। भाइयों ने अपने ही पिता को धोखा दिया, जो उनसे बेहद प्यार करते थे। इससे पता चलता है कि झूठ इंसान को किस हद तक गिरा सकता है।
  2. रोना और गम ज़ाहिर करना हमेशा सच्चा नहीं होता। इंसान को चाहिए कि वह दूसरों की बातों को समझदारी से परखे, खासकर जब बात गंभीर हो।
  3. यह आयत हमें सब्र का पाठ पढ़ाती है। हज़रत याकूब (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटों की बात सुनी, लेकिन उनके दिल को सुकून नहीं मिला। उन्होंने सब्र किया और अल्लाह पर भरोसा रखा। हमें भी मुश्किल वक्त में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
  4. इस कहानी से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह की मदद हमेशा सच्चे और नेक लोगों के साथ होती है। चाहे कितनी भी बड़ी मुसीबत आए, अल्लाह पर यकीन रखने वाले कभी नाकाम नहीं होते।
  5. यह आयत माता-पिता के अधिकारों की भी याद दिलाती है। बच्चों को कभी अपने माता-पिता से झूठ नहीं बोलना चाहिए और न ही उन्हें धोखा देना चाहिए। उनके साथ हमेशा सच्चाई और मुहब्बत से पेश आना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 14-18 — यूसुफ

14قَالُوا لَئِنْ أَكَلَهُ الذِّئْبُ وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّا إِذًا لَّخَاسِرُونَ
वह लोग कहने लगे जब हमारी बड़ी जमाअत है (इस पर भी) अगर उसको भेड़िया खा जाए तो हम लोग यक़ीनन बड़े घाटा उठाने वाले (निकलते) ठहरेगें
15فَلَمَّا ذَهَبُوا بِهِ وَأَجْمَعُوا أَن يَجْعَلُوهُ فِي غَيَابَتِ الْجُبِّ ۚ وَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِ لَتُنَبِّئَنَّهُم بِأَمْرِهِمْ هَٰذَا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
ग़रज़ यूसुफ को जब ये लोग ले गए और इस पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया कि उसको अन्धे कुएँ में डाल दें और (आख़िर ये लोग गुज़रे तो) हमने युसुफ़ के पास 'वही' भेजी कि तुम घबराओ नहीं हम अनक़रीब तुम्हें मरतबे (उँचे मकाम) पर पहुँचाएगे (तब तुम) उनके उस फेल (बद) से तम्बीह (आग़ाह) करोगे
16وَجَاءُوا أَبَاهُمْ عِشَاءً يَبْكُونَ
जब उन्हें कुछ ध्यान भी न होगा और ये लोग रात को अपने बाप के पास (बनवट) से रोते पीटते हुए आए
17قَالُوا يَا أَبَانَا إِنَّا ذَهَبْنَا نَسْتَبِقُ وَتَرَكْنَا يُوسُفَ عِندَ مَتَاعِنَا فَأَكَلَهُ الذِّئْبُ ۖ وَمَا أَنتَ بِمُؤْمِنٍ لَّنَا وَلَوْ كُنَّا صَادِقِينَ
और कहने लगे ऐ अब्बा हम लोग तो जाकर दौड़ने लगे और यूसुफ को अपने असबाब के पास छोड़ दिया इतने में भेड़िया आकर उसे खा गया हम लोग अगर सच्चे भी हो मगर आपको तो हमारी बात का यक़ीन आने का नहीं
18وَجَاءُوا عَلَىٰ قَمِيصِهِ بِدَمٍ كَذِبٍ ۚ قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنفُسُكُمْ أَمْرًا ۖ فَصَبْرٌ جَمِيلٌ ۖ وَاللَّهُ الْمُسْتَعَانُ عَلَىٰ مَا تَصِفُونَ
और ये लोग यूसुफ के कुरते पर झूठ मूठ (भेड़) का खून भी (लगा के) लाए थे, याक़ूब ने कहा (भेड़िया ने ही खाया (बल्कि) तुम्हारे दिल ने तुम्हारे बचाओ के लिए एक बात गढ़ी वरना कुर्ता फटा हुआ ज़रुर होता फिर सब्र व शुक्र है और जो कुछ तुम बयान करते हो उस पर ख़ुदा ही से मदद माँगी जाती है
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अनुवाद — यूसुफ 16

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Tuesday, August 18, 2026

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