Wa iz qaala Ibraaheemu Rabbij `al haazal balada aaminanw wajnubnee wa baniyya an na`budal asnaam
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (वह वक्त याद करो) जब इबराहीम ने (ख़ुदा से) अर्ज़ की थी कि परवरदिगार इस शहर (मक्के) को अमन व अमान की जगह बना दे और मुझे और मेरी औलाद को इस बात को बचा ले कि बुतों की परसतिश करने लगे
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اور جب ابراہیم نے دعا کی کہ میرے پروردگار اس شہر کو (لوگوں کے لیے) امن کی جگہ بنا دے۔ اور مجھے اور میری اولاد کو اس بات سے کہ بتوں کی پرستش کرنے لگیں بچائے رکھ
और (वह वक्त याद करो) जब इबराहीम ने (ख़ुदा से) अर्ज़ की थी कि परवरदिगार इस शहर (मक्के) को अमन व अमान की जगह बना दे और मुझे और मेरी औलाद को इस बात को बचा ले कि बुतों की परसतिश करने लगे
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
وَاجْنُبْنِي: मुझे दूर रख, अलग कर दे।
الْأَصْنَامَ: "صنم" का बहुवचन है, जिसका अर्थ है वे मूर्तियाँ जिनकी आकृति बनाई गई हो। (वहन वे चीज़ें होती हैं जिनकी आकृति न बनाई गई हो)।
तफ़सीर (व्याख्या):
हे नबी! आप उस समय को याद कीजिए जब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब से दुआ की थी। यह दुआ उन्होंने उस समय की जब वे अपने बेटे इस्माईल और उनकी माँ हाजिरा को मक्का की घाटी में बसाकर लौट रहे थे। उन्होंने कहा: "ऐ मेरे रब! इस शहर (मक्का) को अमन वाला बना दे, ताकि इसके निवासी और यहाँ आने वाले हर व्यक्ति को सुरक्षा प्राप्त हो, यहाँ न किसी का खून बहाया जाए और न किसी पर ज़ुल्म किया जाए। और मुझे और मेरी संतान को मूर्तियों की पूजा से दूर रख।"
इस दुआ में इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने दो महत्वपूर्ण चीज़ें माँगीं: पहली, मक्का की भौतिक सुरक्षा और अमन; और दूसरी, जो इससे भी बड़ी है, वह है आस्था की सुरक्षा — यानी शिर्क और बुतपरस्ती से बचाव। यह दुआ उन्होंने अपने लिए और अपनी पूरी संतान के लिए की, क्योंकि वे जानते थे कि सबसे बड़ा नुक़सान ईमान की हिफ़ाज़त में कमी है।
फ़ायदे (सबक):
इस आयत से हमें सीख मिलती है कि हमें अपने देश और शहर की अमन व सलामती के लिए दुआ करनी चाहिए, क्योंकि अमन के बिना न तो दीन क़ायम रह सकता है और न दुनिया।
इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की यह दुआ हमें सिखाती है कि सबसे बड़ी नेमत ईमान और तौहीद है, इसलिए हमें अपने लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए शिर्क और गुमराही से बचने की दुआ करनी चाहिए।
यह आयत मक्का की अज़मत और उसकी हुरमत (पवित्रता) को स्पष्ट करती है, जहाँ अल्लाह ने इब्राहीम की दुआ की बरकत से हमेशा के लिए अमन क़ायम कर दिया।
माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी संतान के दीन और अख़लाक़ की सुधार के लिए दुआ करें, जैसा कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने किया।
इस आयत से यह भी पता चलता है कि इंसान को अपनी कमज़ोरी का एहसास होना चाहिए और अल्लाह से मदद माँगनी चाहिए, क्योंकि गुमराही से बचना केवल अल्लाह की तौफ़ीक़ से ही मुमकिन है।
(और अपनी ज़रुरत के मुवाफिक) जो कुछ तुमने उससे माँगा उसमें से (तुम्हारी ज़रूरत भर) तुम्हे दिया और तुम ख़ुदा की नेमतो गिनती करना चाहते हो तो गिन नहीं सकते हो तू बड़ा बे इन्साफ नाशुक्रा है
और (वह वक्त याद करो) जब इबराहीम ने (ख़ुदा से) अर्ज़ की थी कि परवरदिगार इस शहर (मक्के) को अमन व अमान की जगह बना दे और मुझे और मेरी औलाद को इस बात को बचा ले कि बुतों की परसतिश करने लगे
ऐ मेरे पालने वाले इसमें शक़ नहीं कि इन बुतों ने बहुतेरे लोगों को गुमराह बना छोड़ा तो जो शख़्श मेरी पैरवी करे तो वह मुझ से है और जिसने मेरी नाफ़रमानी की (तो तुझे एख्तेयार है) तू तो बड़ा बख्शने वपला मेहरबान है)
ऐ हमारे पालने वाले मैने तेरे मुअज़िज़ (इज्ज़त वाले) घर (काबे) के पास एक बेखेती के (वीरान) बियाबान (मक्का) में अपनी कुछ औलाद को (लाकर) बसाया है ताकि ऐ हमारे पालने वाले ये लोग बराबर यहाँ नमाज़ पढ़ा करें तो तू कुछ लोगों के दिलों को उनकी तरफ माएल कर (ताकि वह यहाँ आकर आबाद हों) और उन्हें तरह तरह के फलों से रोज़ी अता कर ताकि ये लोग (तेरा) शुक्र करें
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