Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- لَا يُؤْمِنُونَ بِهِ: वे इस (क़ुरआन) पर ईमान नहीं लाते।
- خَلَتْ: गुज़र चुकी है, बीत चुकी है।
- سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ: पहले लोगों (अर्थात् पिछली उम्मतों) के संबंध में अल्लाह की रीति/प्रथा (अर्थात् झुठलाने वालों को विनष्ट करने की प्रथा)।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी मुहम्मद ﷺ को सांत्वना और चेतावनी देते हुए बताते हैं कि जिस प्रकार पिछली उम्मतों के लोग अपने रसूलों को झुठलाते थे और उन पर ईमान नहीं लाते थे, और अल्लाह की यही सुन्नत (रीति) रही है कि वह झुठलाने वालों को विनष्ट कर देता है, ठीक उसी प्रकार मक्का के मुशरिकीन भी इस क़ुरआन पर ईमान नहीं लाएँगे। यह उनकी ज़िद, हठ और अहंकार के कारण है, क्योंकि उन्होंने सत्य को पहचानने के बाद भी उसे स्वीकार करने से इनकार किया।
अल्लाह ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि पिछले लोगों की भी यही स्थिति थी—वे रसूलों के पास आए सत्य को नकारते थे, और अल्लाह की सुन्नत (प्रथा) यही रही कि वह हठधर्मी और झुठलाने वालों को पकड़ लेता था और उन्हें विनष्ट कर देता था। यह आयत मक्का के काफ़िरों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि यदि वे अपनी ज़िद और इनकार पर डटे रहे, तो उनका अंजाम भी पिछले झुठलाने वालों जैसा ही होगा—विनाश और अल्लाह की यातना।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- अल्लाह की सुन्नत (रीति) अपरिवर्तनीय है: अल्लाह की प्रथा यह है कि वह सत्य को झुठलाने वालों को अंततः पकड़ लेता है। यह हमें सिखाता है कि सत्य के विरुद्ध ज़िद और हठ करने वालों का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता।
- सत्य की विजय अवश्यंभावी है: चाहे कितने ही लोग सत्य को नकारें, अल्लाह अपने दीन (धर्म) को अवश्य स्थापित करेगा और झुठलाने वालों को नीचा दिखाएगा। इससे मुसलमानों को धैर्य और साहस मिलता है।
- चेतावनी और सावधानी: यह आयत उन लोगों के लिए एक कड़ी चेतावनी है जो जानबूझकर सत्य को स्वीकार नहीं करते। यह हमें सिखाती है कि हमें अपने दिलों को हठ और अहंकार से पाक रखना चाहिए और सत्य को खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए।
- रसूल ﷺ के लिए सांत्वना: अल्लाह ने अपने नबी को यह बताकर दिलासा दिया कि उनकी क़ौम का इनकार कोई नई बात नहीं, बल्कि यह पिछली उम्मतों का तरीका रहा है। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य के प्रचार में रुकावटें आएँगी, लेकिन हमें डटे रहना चाहिए।
- क़ुरआन पर ईमान की अहमियत: यह आयत क़ुरआन की सच्चाई और उस पर ईमान लाने की अहमियत को उजागर करती है। जो लोग क़ुरआन को नकारते हैं, वे अल्लाह की यातना के हक़दार बनते हैं, जबकि जो इसे मानते हैं, वे सफलता और मार्गदर्शन पाते हैं।
📜 आयत 11-15 — सूरा अल-हिज्र
अनुवाद — अल-हिज्र 13
सूरा अल-हिज्र आयत 13 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ये कुफ्फ़ार इस (क़ुरान) पर ईमान न लाएँगें और (ये…सूरा आयत 13/99 — सूरा अल-हिज्र الحجر (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-हिज्र सुनें, सूरा अल-हिज्र अनुवाद, सूरा अल-हिज्र mp3, सूरा अल-हिज्र pdf. आयत 11–15. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-हिज्र
पवित्र क़ुरआन
Saturday, October 3, 2026
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