अल-बकरा · 11/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ قَالُوا إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ ۝١١
Wa izaa qeela lahum laa tufsidoo fil ardi qaalo innamaa nahnu muslihoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो (तो) कहते हैं कि हम तो सिर्फ इसलाह करते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَا تُفْسِدُوا: फ़साद मत करो, यानी ज़मीन में बिगाड़ पैदा मत करो।
  • مُصْلِحُونَ: सुधार करने वाले, इस्लाह करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) या अहले-किताब (यहूदियों) से कहा जाता है कि ज़मीन में फ़साद मत फैलाओ — यानी कुफ़्र और गुनाहों के ज़रिए लोगों को ईमान और सच्चाई के रास्ते से रोको मत, मोमिनों के राज़ दुश्मनों तक मत पहुँचाओ, और काफ़िरों से दोस्ती मत करो — तो वे झूठ और हठधर्मी से कहते हैं: "हम तो सिर्फ़ इस्लाह (सुधार) करने वाले हैं।" यानी वे अपने फ़सादी कामों को सुधार और भलाई का नाम देकर सही ठहराने की कोशिश करते हैं, जबकि हक़ीक़त में उनका काम पूरी तरह फ़साद और बिगाड़ है। वे अपने इस झूठे दावे से लोगों को धोखा देना चाहते हैं, जैसे वे "हम ईमान लाए" कहकर झूठ बोलते हैं।

फ़ायदे (सबक़):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि बुराई और फ़साद को कभी भी अच्छाई और सुधार के नाम से पेश नहीं करना चाहिए। अल्लाह के नज़दीक वही काम नेक है जो उसकी रज़ा के मुताबिक़ हो, न कि जो इंसान अपनी मर्ज़ी से अच्छा समझ ले।
  2. मुनाफ़िक़ों की पहचान यह है कि वे अपने गलत कामों को सही ठहराने के लिए झूठे दावे करते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने अमल की हक़ीक़त को परखें और दिखावे से बचें।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम किसी को बुराई से रोकें, तो उसका तरीक़ा नर्म और हिकमत वाला हो, और जब हमें कोई नसीहत दे, तो उसे ग़ौर से सुनें और अपने अमल की जाँच करें।
  4. इस्लाम सिखाता है कि ज़मीन में अमन और सुधार अल्लाह को बहुत पसंद है, और फ़साद व बिगाड़ से बचना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है। यही वह रास्ता है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 9-13 — अल-बकरा

9يُخَادِعُونَ اللَّهَ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَمَا يَخْدَعُونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
खुदा को और उन लोगों को जो ईमान लाए धोखा देते हैं हालाँकि वह अपने आपको धोखा देते हैं और कुछ शऊर नहीं रखते हैं
10فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَهُمُ اللَّهُ مَرَضًا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ
उनके दिलों में मर्ज़ था ही अब खुदा ने उनके मर्ज़ को और बढ़ा दिया और चूँकि वह लोग झूठ बोला करते थे इसलिए उन पर तकलीफ देह अज़ाब है
11وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ قَالُوا إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ
और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो (तो) कहते हैं कि हम तो सिर्फ इसलाह करते हैं
12أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْمُفْسِدُونَ وَلَٰكِن لَّا يَشْعُرُونَ
ख़बरदार हो जाओ बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं
13وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا كَمَا آمَنَ النَّاسُ قَالُوا أَنُؤْمِنُ كَمَا آمَنَ السُّفَهَاءُ ۗ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ السُّفَهَاءُ وَلَٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ
और जब उनसे कहा जाता है कि जिस तरह और लोग ईमान लाए हैं तुम भी ईमान लाओ तो कहते हैं क्या हम भी उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह और बेवकूफ़ लोग ईमान लाएँ, ख़बरदार हो जाओ लोग बेवक़ूफ़ हैं लेकिन नहीं जानते
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अनुवाद — अल-बकरा 11

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Tuesday, August 18, 2026

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