अल-बकरा · 84/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَاءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ أَنفُسَكُم مِّن دِيَارِكُمْ ثُمَّ أَقْرَرْتُمْ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ ۝٨٤
Wa iz akhaznaa meesaa qakum laa tasfikoona dimaaa`akum wa laa tukrijoona anfusakum min diyaarikum summa aqrartum wa antum tashhadoon
📖 हिंदी अर्थ
और (वह वक्त याद करो) जब हमने तुम (तुम्हारे बुर्ज़ुगों) से अहद लिया था कि आपस में खूरेज़ियाँ न करना और न अपने लोगों को शहर बदर करना तो तुम (तुम्हारे बुर्जुग़ों) ने इक़रार किया था और तुम भी उसकी गवाही देते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مِيثَاقًا: पक्का वचन, दृढ़ प्रतिज्ञा।
  • لَا تَسْفِكُونَ: तुम न बहाओ (खून न करो)।
  • دِمَاءَكُمْ: अपने खून (यानी एक-दूसरे का खून)।
  • أَنفُسَكُم: अपने आपको (यानी एक-दूसरे को)।
  • مِن دِيَارِكُمْ: अपने घरों से।
  • أَقْرَرْتُمْ: तुमने स्वीकार किया, मान लिया।
  • تَشْهَدُونَ: तुम गवाह हो, तुम प्रमाण देते हो।

विस्तृत व्याख्या:

ऐ बनी इसराइल! उस समय को याद करो जब हमने तुमसे दृढ़ वचन लिया था कि तुम आपस में एक-दूसरे का खून नहीं बहाओगे और न ही एक-दूसरे को उनके घरों से निकालोगे। यह वचन तुम्हारी तौरात में दर्ज था और यह एक गंभीर धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी थी। तुमने उस समय इस वचन को सुना, समझा और अपनी ज़ुबान से स्वीकार भी किया। तुम स्वयं इस बात के गवाह थे कि यह वचन सत्य है और तुमने इसे मानने का इक़रार किया था।

यहाँ अल्लाह तआला बनी इसराइल को उनके उस ऐतिहासिक वचन की याद दिला रहे हैं, जो उन्होंने तौरात के समय में दिया था। इस वचन का सार यह था कि वे एक-दूसरे के खून को हलाल न समझें और न ही किसी को उसके वतन और घर से बेदखल करें। यह एक सामाजिक और अख़लाक़ी क़ानून था, जो समाज में अमन और भाईचारा क़ायम रखने के लिए ज़रूरी था। लेकिन अफ़सोस कि उन्होंने इस वचन को तोड़ा, अपने नबियों को शहीद किया और आपसी लड़ाइयों में एक-दूसरे के खून बहाए। इस आयत में अल्लाह उन्हें उनके इसी विश्वासघात पर टोक रहे हैं।


फ़ायदे और सबक़:

  1. वचन की पवित्रता: इस आयत से सीख मिलती है कि अल्लाह से किया गया वचन और आपसी समझौते बहुत पवित्र होते हैं। उन्हें तोड़ना बड़ा गुनाह है। मुसलमान को चाहिए कि वह अपने वादों को पूरा करे, चाहे वह अल्लाह से हो या इंसानों से।
  2. खून की हुरमत: इस्लाम में इंसान का खून बहुत कीमती है। किसी भी मासूम इंसान की जान लेना पूरी इंसानियत का क़त्ल है। यह आयत हमें सिखाती है कि आपसी दुश्मनी, बग़्ज़ और नफ़रत की वजह से किसी की जान नहीं ली जा सकती।
  3. घर से निकालना ज़ुल्म है: किसी इंसान को उसके घर, वतन या ज़मीन से बेदखल करना एक बड़ा ज़ुल्म है। इस्लाम ने इस पर सख्त मनाही की है। आज दुनिया में जो लोग दूसरों को उनके घरों से निकालते हैं, वे इसी वचन की खिलाफ़त कर रहे हैं।
  4. गवाही की ज़िम्मेदारी: जब इंसान किसी सत्य को जानता है और उसे स्वीकार करता है, तो उस पर अमल करना उसकी ज़िम्मेदारी बन जाती है। सिर्फ़ ज़ुबान से इक़रार करना काफी नहीं, बल्कि अमल से उसे साबित करना ज़रूरी है।
  5. अमन और भाईचारा: यह आयत समाज में अमन, भाईचारे और आपसी मोहब्बत की तालीम देती है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह समाज में शांति फैलाने वाला हो, न कि फ़साद और खून-खराबा करने वाला।


📜 आयत 82-86 — सूरा अल-बकरा

82وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
और जो लोग ईमानदार हैं और उन्होंने अच्छे काम किए हैं वही लोग जन्नती हैं कि हमेशा जन्नत में रहेंगे
83وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَ بَنِي إِسْرَائِيلَ لَا تَعْبُدُونَ إِلَّا اللَّهَ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا وَذِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَقُولُوا لِلنَّاسِ حُسْنًا وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا مِّنكُمْ وَأَنتُم مُّعْرِضُونَ
और (वह वक्त याद करो) जब हमने बनी ईसराइल से (जो तुम्हारे बुर्जुग़ थे) अहद व पैमान लिया था कि खुदा के सिवा किसी की इबादत न करना और माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों के साथ अच्छे सुलूक करना और लोगों के साथ अच्छी तरह (नरमी) से बातें करना और बराबर नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना फिर तुममें से थोड़े आदिमियों के सिवा (सब के सब) फिर गए और तुम लोग हो ही इक़रार से मुँह फेरने वाले
84وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَاءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ أَنفُسَكُم مِّن دِيَارِكُمْ ثُمَّ أَقْرَرْتُمْ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
और (वह वक्त याद करो) जब हमने तुम (तुम्हारे बुर्ज़ुगों) से अहद लिया था कि आपस में खूरेज़ियाँ न करना और न अपने लोगों को शहर बदर करना तो तुम (तुम्हारे बुर्जुग़ों) ने इक़रार किया था और तुम भी उसकी गवाही देते हो
85ثُمَّ أَنتُمْ هَٰؤُلَاءِ تَقْتُلُونَ أَنفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَرِيقًا مِّنكُم مِّن دِيَارِهِمْ تَظَاهَرُونَ عَلَيْهِم بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَإِن يَأْتُوكُمْ أُسَارَىٰ تُفَادُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ إِخْرَاجُهُمْ ۚ أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ الْكِتَابِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍ ۚ فَمَا جَزَاءُ مَن يَفْعَلُ ذَٰلِكَ مِنكُمْ إِلَّا خِزْيٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ يُرَدُّونَ إِلَىٰ أَشَدِّ الْعَذَابِ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
(कि हाँ ऐसा हुआ था) फिर वही लोग तो तुम हो कि आपस में एक दूसरे को क़त्ल करते हो और अपनों से एक जत्थे के नाहक़ और ज़बरदस्ती हिमायती बनकर दूसरे को शहर बदर करते हो (और लुत्फ़ तो ये है कि) अगर वही लोग क़ैदी बनकर तम्हारे पास (मदद माँगने) आए तो उनको तावान देकर छुड़ा लेते हो हालाँकि उनका निकालना ही तुम पर हराम किया गया था तो फिर क्या तुम (किताबे खुदा की) बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार करते हो पस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि ज़िन्दगी भर की रूसवाई हो और (आख़िरकार) क़यामत के दिन सख्त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो खुदा उससे ग़ाफ़िल नहीं है
86أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ ۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
यही वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की ज़िन्दगी ख़रीद पस न उनके अज़ाब ही में तख्फ़ीफ़ (कमी) की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे
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अनुवाद — अल-बकरा 84

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Monday, September 7, 2026

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