अल-बकरा · 88/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
وَقَالُوا قُلُوبُنَا غُلْفٌ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًا مَّا يُؤْمِنُونَ ۝٨٨
Wa qaaloo quloobunaa ghulf; bal la`anahumul laahu bikufrihim faqaleelam maa yu`minoon
📖 हिंदी अर्थ
और कहने लगे कि हमारे दिलों पर ग़िलाफ चढ़ा हुआ है (ऐसा नहीं) बल्कि उनके कुफ्र की वजह से खुदा ने उनपर लानत की है पस कम ही लोग ईमान लाते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • غُلْفٌ (ग़ुल्फ़): ढके हुए, आवरण में लिपटे हुए, जिसमें कोई बात प्रवेश न कर सके।
  • لَعَنَهُمُ (ला'नहुम): उन्हें रहमत से दूर कर दिया, फटकारा।
  • فَقَلِيلًا مَا يُؤْمِنُونَ (फ़क़लीलन मा यु'मिनून): वे बहुत कम ईमान लाते हैं, यानी उनका ईमान नाममात्र का है जो उन्हें कोई लाभ नहीं देता।

तफ़सीर (व्याख्या):

यहूदियों ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से कहा: "हमारे दिल बंद और ढके हुए हैं, उन पर परदा पड़ा है, इसलिए आपकी बात हमारे दिलों तक नहीं पहुँचती और न ही हम उसे समझ पाते हैं।" उन्होंने यह बहाना बनाया कि उनके दिल सीलबंद हैं, इसलिए वे आपका संदेश स्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन अल्लाह ने उनके इस दावे को झूठा बताया और फ़रमाया: "ऐसा नहीं है जैसा वे कहते हैं, बल्कि अल्लाह ने उन्हें उनके कुफ़्र (इनकार) के कारण अपनी रहमत से दूर कर दिया और उन पर लानत भेजी।" यानी उनके दिलों की सख्ती और अंधापन अल्लाह की ओर से उनके लिए सज़ा है, क्योंकि उन्होंने सच्चाई को जानते हुए भी उसे ठुकरा दिया। नतीजा यह हुआ कि वे बहुत कम ईमान लाते हैं — यानी उनमें से जो ईमान लाता भी है, उसका ईमान अधूरा और बेकार है, या फिर उनका ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी है, दिल से नहीं। उनका यह कथन कि "हमारे दिल ढके हुए हैं" वास्तव में उनकी ज़िद और हठधर्मिता को दर्शाता है, न कि किसी वास्तविक बाधा को।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह की रहमत से दूर होने का सबसे बड़ा कारण कुफ़्र और सच्चाई का इनकार है। जो व्यक्ति सत्य को जानकर उसे ठुकराता है, उसका दिल धीरे-धीरे सख्त हो जाता है और वह हिदायत से महरूम हो जाता है।
  2. बहाने बनाना और अपनी ग़लतियों को छिपाना ईमान की कमज़ोरी की निशानी है। सच्चा मुसलमान वह है जो सच्चाई सुनते ही उसे क़बूल कर ले, चाहे वह उसकी अपनी राय के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि दिल की सफ़ाई और नम्रता अल्लाह की तरफ़ से एक बड़ी नेमत है। हमें दुआ करनी चाहिए कि अल्लाह हमारे दिलों को सच्चाई क़बूल करने की तौफ़ीक़ दे और उन्हें सख्ती और अंधेपन से बचाए।
  4. ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से कहने का नाम नहीं, बल्कि दिल से यक़ीन और अमल से साबित होता है। जो ईमान अमल के साथ न हो, वह अल्लाह के यहाँ बेकार है।


📜 आयत 86-90 — सूरा अल-बकरा

86أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ ۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
यही वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की ज़िन्दगी ख़रीद पस न उनके अज़ाब ही में तख्फ़ीफ़ (कमी) की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे
87وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَقَفَّيْنَا مِن بَعْدِهِ بِالرُّسُلِ ۖ وَآتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَأَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ ۗ أَفَكُلَّمَا جَاءَكُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوَىٰ أَنفُسُكُمُ اسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًا تَقْتُلُونَ
और ये हक़ीक़ी बात है कि हमने मूसा को किताब (तौरेत) दी और उनके बाद बहुत से पैग़म्बरों को उनके क़दम ब क़दम ले चलें और मरियम के बेटे ईसा को (भी बहुत से) वाजेए व रौशन मौजिजे दिए और पाक रूह जिबरील के ज़रिये से उनकी मदद की क्या तुम उस क़दर बददिमाग़ हो गए हो कि जब कोई पैग़म्बर तुम्हारे पास तुम्हारी ख्वाहिशे नफ़सानी के ख़िलाफ कोई हुक्म लेकर आया तो तुम अकड़ बैठे फिर तुमने बाज़ पैग़म्बरों को तो झुठलाया और बाज़ को जान से मार डाला
88وَقَالُوا قُلُوبُنَا غُلْفٌ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًا مَّا يُؤْمِنُونَ
और कहने लगे कि हमारे दिलों पर ग़िलाफ चढ़ा हुआ है (ऐसा नहीं) बल्कि उनके कुफ्र की वजह से खुदा ने उनपर लानत की है पस कम ही लोग ईमान लाते हैं
89وَلَمَّا جَاءَهُمْ كِتَابٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا مِن قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى الَّذِينَ كَفَرُوا فَلَمَّا جَاءَهُم مَّا عَرَفُوا كَفَرُوا بِهِ ۚ فَلَعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الْكَافِرِينَ
और जब उनके पास खुदा की तरफ़ से किताब (कुरान आई और वह उस किताब तौरेत) की जो उन के पास तसदीक़ भी करती है। और उससे पहले (इसकी उम्मीद पर) काफ़िरों पर फतेहयाब होने की दुआएँ माँगते थे पस जब उनके पास वह चीज़ जिसे पहचानते थे आ गई तो लगे इन्कार करने पस काफ़िरों पर खुदा की लानत है
90بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ فَبَاءُوا بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍ ۚ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ
क्या ही बुरा है वह काम जिसके मुक़ाबले में (इतनी बात पर) वह लोग अपनी जानें बेच बैठे हैं कि खुदा अपने बन्दों से जिस पर चाहे अपनी इनायत से किताब नाज़िल किया करे इस रश्क से जो कुछ खुदा ने नाज़िल किया है सबका इन्कार कर बैठे पस उन पर ग़ज़ब पर ग़ज़ब टूट पड़ा और काफ़िरों के लिए (बड़ी) रूसवाई का अज़ाब है
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
88आयत

अनुवाद — अल-बकरा 88

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Tuesday, September 29, 2026

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