अल-मोमिनुन · 28/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
فَإِذَا اسْتَوَيْتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى الْفُلْكِ فَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي نَجَّانَا مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ۝٢٨
Fa izas tawaita ata wa mam ma`aka `alal fulki faqulil hamdu lillaahil lazee najjaanaa minal qawmiz zalimeen
📖 हिंदी अर्थ
ग़रज़ जब तुम अपने हमराहियों के साथ कश्ती पर दुरुस्त बैठो तो कहो तमाम हम्दो सना की सज़ावार खुदा ही है जिसने हमको ज़ालिम लोगों से नजात दी
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • اسْتَوَيْتَ – तुम सवार होकर अच्छी तरह बैठ जाओ, स्थिर हो जाओ।
  • الْفُلْك – नाव या जहाज़।
  • نَجَّانَا – हमें बचा लिया, मुक्ति दिला दी।
  • الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ – अत्याचारी लोग, यहाँ अर्थ है काफ़िरों से, जिन्होंने अल्लाह पर ईमान नहीं लाया और अपने नबी को झुठलाया।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अल्लाह तआला ने हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) को हुक्म दिया कि वे अपने साथ ईमान लाने वालों को लेकर नाव में सवार हो जाएँ, और तूफ़ान आ गया, पानी हर तरफ़ फैल गया, तो अल्लाह ने उन्हें हिदायत दी कि जब तुम और तुम्हारे साथी नाव पर अच्छी तरह सवार हो जाओ और वह पानी पर चलने लगे, तो उस वक़्त अल्लाह का शुक्र अदा करो और यह दुआ पढ़ो: "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने हमें ज़ालिम क़ौम से नजात दी।"

यह सिखाया गया कि मुसीबत से निकलने और अल्लाह की रहमत से बच निकलने पर सबसे पहले अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए। यह सिर्फ़ नूह (अलैहिस्सलाम) के लिए नहीं था, बल्कि हर मोमिन के लिए यही तरीक़ा है — जब अल्लाह किसी मुसीबत, बीमारी, ख़तरे या दुश्मन के ज़ुल्म से बचा लेता है, तो उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए और उसकी तारीफ़ करनी चाहिए।

इस आयत में एक बड़ी नसीहत है कि अल्लाह के नबी भी जब ख़तरे से बचे, तो उन्होंने अल्लाह की तारीफ़ की — हमें भी चाहिए कि हर नेमत और हर बचाव पर अल्लाह का शुक्र अदा करें। यह शुक्र सिर्फ़ ज़बान से नहीं, बल्कि दिल से और अपने अमल से भी करें — यानी अल्लाह की इबादत करें, उसके हुक्म मानें और उसकी नाफ़रमानी से बचें।

यह आयत हमें सिखाती है कि जब भी कोई मुश्किल आए, तो अल्लाह पर भरोसा रखें, और जब वह मुश्किल दूर हो जाए, तो उसका शुक्र अदा करें। यही मोमिन की पहचान है — वह हर हाल में अल्लाह को याद रखता है, तकलीफ़ में सब्र करता है और राहत में शुक्र करता है। अल्लाह तआला हम सबको यह तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 26-30 — अल-मोमिनुन

26قَالَ رَبِّ انصُرْنِي بِمَا كَذَّبُونِ
नूह ने (ये बातें सुनकर) दुआ की ऐ मेरे पलने वाले मेरी मदद कर
27فَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِ أَنِ اصْنَعِ الْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَإِذَا جَاءَ أَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُ ۙ فَاسْلُكْ فِيهَا مِن كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ مِنْهُمْ ۖ وَلَا تُخَاطِبْنِي فِي الَّذِينَ ظَلَمُوا ۖ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ
इस वजह से कि उन लोगों ने मुझे झुठला दिया तो हमने नूह के पास 'वही' भेजी कि तुम हमारे सामने हमारे हुक्म के मुताबिक़ कश्ती बनाना शुरु करो फिर जब कल हमारा अज़ाब आ जाए और तन्नूर (से पानी) उबलने लगे तो तुम उसमें हर किस्म (के जानवरों में) से (नर मादा) दो दो का जोड़ा और अपने लड़के बालों को बिठा लो मगर उन में से जिसकी निस्बत (ग़रक़ होने का) पहले से हमारा हुक्म हो चुका है (उन्हें छोड़ दो) और जिन लोगों ने (हमारे हुकम से) सरकशी की है उनके बारे में मुझसे कुछ कहना (सुनना) नहीं क्योंकि ये लोग यकीनन डूबने वाले है
28فَإِذَا اسْتَوَيْتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى الْفُلْكِ فَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي نَجَّانَا مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
ग़रज़ जब तुम अपने हमराहियों के साथ कश्ती पर दुरुस्त बैठो तो कहो तमाम हम्दो सना की सज़ावार खुदा ही है जिसने हमको ज़ालिम लोगों से नजात दी
29وَقُل رَّبِّ أَنزِلْنِي مُنزَلًا مُّبَارَكًا وَأَنتَ خَيْرُ الْمُنزِلِينَ
और दुआ करो कि ऐ मेरे पालने वाले तू मुझको (दरख्त के पानी की) बा बरकत जगह में उतारना और तू तो सब उतारने वालो ंसे बेहतर है
30إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ وَإِن كُنَّا لَمُبْتَلِينَ
इसमें शक नहीं कि हसमें (हमारी क़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ हैं और हमको तो बस उनका इम्तिहान लेना मंज़ूर था
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 28

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Tuesday, August 18, 2026

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