अल-मोमिनुन · 99/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
حَتَّىٰ إِذَا جَاءَ أَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِ ۝٩٩
Hattaaa izaa jaaa`a ahada humul mawtu qaala Rabbir ji`oon
📖 हिंदी अर्थ
(और कुफ्फ़ार तो मानेगें नहीं) यहाँ तक कि जब उनमें से किसी को मौत आयी तो कहने लगे परवरदिगार तू मुझे (एक बार) उस मुक़ाम (दुनिया) में छोड़ आया हूँ फिर वापस कर दे ताकि मै (अपकी दफ़ा) अच्छे अच्छे काम करूं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَتَّى إِذَا جَاءَ أَحَدَهُمُ الْمَوْتُ: यहाँ तक कि जब उनमें से किसी एक के पास मृत्यु आ जाए।
  • قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِ: वह कहता है, "मेरे रब! मुझे (दुनिया में) वापस भेज दे।"

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों की हालत बयान कर रहा है जो दुनिया में अल्लाह की इबादत से ग़ाफ़िल रहे, अपने रब के हुक्मों को भूल गए, और अपनी ख्वाहिशों और लज़्ज़तों में डूबे रहे। जब उनमें से किसी एक के पास मौत का फ़रिश्ता आता है, और वह अपनी आँखों से वह कुछ देख लेता है जो उसके लिए अज़ाब के तौर पर तैयार किया गया है, तो उस वक़्त उसे अपनी ग़लतियों का एहसास होता है, पछतावा उसे जकड़ लेता है, और वह चीख़ उठता है: "मेरे रब! मुझे दोबारा दुनिया में वापस भेज दे!"

वह सोचता है कि शायद उसे एक और मौक़ा मिल जाए, तो वह अच्छे काम करेगा, अल्लाह की इबादत करेगा, और अपनी ज़िंदगी को सही राह पर लगाएगा। लेकिन यह माँग बिल्कुल बेकार है, क्योंकि मौत का वक़्त आ चुका है, और वापसी का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो चुका है। यह वही लम्हा है जब इंसान को सच्चाई का एहसास होता है, लेकिन वह एहसास उसे कोई फ़ायदा नहीं पहुँचा सकता।

यह आयत हमें बताती है कि मौत से पहले ही अपनी ज़िंदगी को संवार लेना चाहिए। जो लोग दुनिया में अल्लाह को भूलकर गुनाहों में डूबे रहते हैं, उनकी यही हालत होगी कि जब मौत आएगी, तो वे मदद की गुहार लगाएँगे, लेकिन उनकी गुहार कबूल नहीं होगी।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमारे लिए एक बहुत बड़ी नसीहत है। अल्लाह तआला ने हमें दुनिया में इसलिए भेजा है ताकि हम उसकी इबादत करें, उसके हुक्मों पर चलें, और अपनी ज़िंदगी को नेकी और अच्छाई से भर दें। मौत का वक़्त तय है, लेकिन हमें नहीं पता कि वह कब आएगी। इसलिए हमें हर पल इस बात का एहसास रखना चाहिए कि हमें अपने रब के सामने हाज़िर होना है।

अल्लाह तआला बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है। उसने हमें ज़िंदगी का यह खूबसूरत मौक़ा दिया है, और तौबा का दरवाज़ा खुला रखा है। जब तक हम ज़िंदा हैं, हम अपनी ग़लतियों को सुधार सकते हैं, अपने गुनाहों से तौबा कर सकते हैं, और अल्लाह की रहमत के हक़दार बन सकते हैं। लेकिन जब मौत आ जाएगी, तो फिर मौक़ा नहीं मिलेगा। इसलिए आज ही अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की राह में लगाएँ, नमाज़ की पाबंदी करें, अच्छे काम करें, और अल्लाह से माफ़ी माँगते रहें। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत की तरफ ले जाएगा, और उस दिन की शर्मिंदगी और पछतावे से बचाएगा।



📜 आयत 97-101 — अल-मोमिनुन

97وَقُل رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ
और (ये भी) दुआ करो कि ऐ मेरे पालने वाले मै शैतान के वसवसों से तेरी पनाह माँगता हूँ
98وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ
और ऐ मेरे परवरदिगार इससे भी तेरी पनाह माँगता हूँ कि शयातीन मेरे पास आएँ
99حَتَّىٰ إِذَا جَاءَ أَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِ
(और कुफ्फ़ार तो मानेगें नहीं) यहाँ तक कि जब उनमें से किसी को मौत आयी तो कहने लगे परवरदिगार तू मुझे (एक बार) उस मुक़ाम (दुनिया) में छोड़ आया हूँ फिर वापस कर दे ताकि मै (अपकी दफ़ा) अच्छे अच्छे काम करूं
100لَعَلِّي أَعْمَلُ صَالِحًا فِيمَا تَرَكْتُ ۚ كَلَّا ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَائِلُهَا ۖ وَمِن وَرَائِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
(जवाब दिया जाएगा) हरगिज़ नहीं ये एक लग़ो बात है- जिसे वह बक रहा और उनके (मरने के) बाद (आलमे) बरज़ख़ है
101فَإِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ فَلَا أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍ وَلَا يَتَسَاءَلُونَ
(जहाँ) क़ब्रों से उठाए जाएँगें (रहना होगा) फिर जिस वक्त सूर फूँका जाएगा तो उस दिन न लोगों में क़राबत दारियाँ रहेगी और न एक दूसरे की बात पूछेंगे
अल-मोमिनुनकुरान सूची
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मक्कीRevelation
99आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 99

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Tuesday, August 18, 2026

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