अल-फुरकान · 67/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
وَالَّذِينَ إِذَا أَنفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًا ۝٦٧
Wallazeena izaaa anfaqoo lam yusrifoo wa lam yaqturoo wa kaana baina zaalika qawaamaa
📖 हिंदी अर्थ
और वह लोग कि जब खर्च करते हैं तो न फुज़ूल ख़र्ची करते हैं और न तंगी करते हैं और उनका ख़र्च उसके दरमेयान औसत दर्जे का रहता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَمْ يُسْرِفُوا (लम युसरिफू): हद से आगे नहीं बढ़े, फिजूलखर्ची नहीं की।
  • وَلَمْ يَقْتُرُوا (व लम यक़्तुरू): कंजूसी नहीं की, तंगी नहीं की।
  • قَوَامًا (क़वामन): बीच का रास्ता, संतुलित और न्यायपूर्ण तरीका।

तफसीर:

अल्लाह तआला इस आयत में अपने नेक बंदों की एक और खूबसूरत सिफत बयान फरमा रहे हैं। ये वो लोग हैं जो जब भी खर्च करते हैं, तो ना तो फिजूलखर्ची करते हैं और ना ही कंजूसी। वे ना तो अपनी कमाई को हद से ज्यादा उड़ाते हैं, और ना ही अपने ऊपर और अपने अधीन लोगों पर खर्च करने में तंगी पैदा करते हैं। उनका खर्च हमेशा इन दोनों सीमाओं के बीच संतुलित, न्यायपूर्ण और मध्यम होता है।

यानी उनका तरीका ऐसा होता है कि ना तो वे सारा माल बेकार में लुटा देते हैं, और ना ही अपने परिवार और ज़रूरतमंदों पर खर्च करने से रुकते हैं। वे इस्लाम की शिक्षा के अनुसार एक आदर्श और मुतवाज़िन (संतुलित) ज़िंदगी जीते हैं। यही वह मध्यम मार्ग है जिसकी तालीम क़ुरआन और रसूलुल्लाह ﷺ ने दी है।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में खर्च करने का सबसे अच्छा तरीका "संतुलन" है। अल्लाह तआला ने माल को इंसान के लिए रिज़्क़ बनाया है, और उसका सही इस्तेमाल यही है कि इसे ना तो बरबाद किया जाए और ना ही रोककर रखा जाए। जो लोग इस संतुलन को अपनाते हैं, वे दुनिया में भी खुशहाल रहते हैं और आख़िरत में भी कामयाब होते हैं। यही अल्लाह को पसंदीदा बंदों की पहचान है, और यही वह रास्ता है जो इंसान को अल्लाह की मुहब्बत और उसकी रहमत के क़रीब ले जाता है।



📜 आयत 65-69 — अल-फुरकान

65وَالَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا
और वह लोग जो दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हम से जहन्नुम का अज़ाब फेरे रहना क्योंकि उसका अज़ाब बहुत (सख्त और पाएदार होगा)
66إِنَّهَا سَاءَتْ مُسْتَقَرًّا وَمُقَامًا
बेशक वह बहुत बुरा ठिकाना और बुरा मक़ाम है
67وَالَّذِينَ إِذَا أَنفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًا
और वह लोग कि जब खर्च करते हैं तो न फुज़ूल ख़र्ची करते हैं और न तंगी करते हैं और उनका ख़र्च उसके दरमेयान औसत दर्जे का रहता है
68وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ يَلْقَ أَثَامًا
और वह लोग जो ख़ुदा के साथ दूसरे माबूदों की परसतिश नही करते और जिस जान के मारने को ख़ुदा ने हराम कर दिया है उसे नाहक़ क़त्ल नहीं करते और न ज़िना करते हैं और जो शख्स ऐसा करेगा वह आप अपने गुनाह की सज़ा भुगतेगा
69يُضَاعَفْ لَهُ الْعَذَابُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَيَخْلُدْ فِيهِ مُهَانًا
कि क़यामत के दिन उसके लिए अज़ाब दूना कर दिया जाएगा और उसमें हमेशा ज़लील व ख़वार रहेगा
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अनुवाद — अल-फुरकान 67

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Tuesday, August 18, 2026

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