अश-शुआरा · 101/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍ ۝١٠١
Wa laa sadeeqin hameem
📖 हिंदी अर्थ
और न कोई दिलबन्द दोस्त हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • صَدِيقٍ (सदीक़): वह मित्र जो सच्चा और ख़ालिस मुहब्बत रखने वाला हो।
  • حَمِيمٍ (हमीम): वह करीबी और ख़ास दोस्त जो दिल से शफ़क़त रखता हो, और मुसीबत के वक़्त काम आए।

तफ़सीर:

यह आयत उस हालत का बयान कर रही है जो क़यामत के दिन गुनाहगारों की होगी। जब वे अपने अंजाम को देखेंगे और अज़ाब से बचने की कोई सूरत न पाएँगे, तो वे कहेंगे: "हमारे लिए न कोई सिफ़ारिश करने वाला है जो हमें अज़ाब से छुड़ा सके, और न ही कोई सच्चा दोस्त जो हम पर शफ़क़त करे और हमारी मदद को आगे बढ़े।"

इस आयत में "صَدِيقٍ" से मुराद वह दोस्त है जो सच्ची मुहब्बत रखता हो, और "حَمِيمٍ" से मुराद वह करीबी रिश्तेदार या ख़ास दोस्त है जो दिल से हमदर्दी रखता हो। मगर उस दिन ऐसा कोई नहीं होगा। दुनिया में जिन लोगों से मुहब्बत और रिश्तों की उम्मीदें वाबस्ता थीं, वे सब बेबस और लाचार होंगे। हर शख्स सिर्फ अपनी फ़िक्र में डूबा होगा, और कोई किसी की मदद नहीं कर सकेगा।

यह आयत हमें सबक़ देती है कि इस दुनिया की मुहब्बतें और रिश्ते, चाहे कितने भी गहरे क्यों न हों, आख़िरत के दिन किसी काम न आएँगे। असली सहारा और मददगार सिर्फ अल्लाह है। इसलिए हमें चाहिए कि अपनी ज़िंदगी में अल्लाह की रज़ा को सबसे बड़ा मक़सद बनाएँ, और ऐसे अमल करें जो उस दिन हमारे काम आएँ। अगर हम दुनिया में अल्लाह के सच्चे बंदे बनकर रहें, और उसकी राह में दूसरों के साथ भलाई करें, तो अल्लाह खुद हमारा दोस्त और मददगार होगा, और उस दिन हमें अज़ाब से महफ़ूज़ रखेगा। याद रखिए, सच्ची मुहब्बत वही है जो अल्लाह की राह में हो, और सच्चा दोस्त वही है जो हमें अल्लाह की याद दिलाए और उसकी इबादत पर मदद करे। ऐसे दोस्तों की संगत इख्तियार करें, और उस दिन की रुसवाई से बचने के लिए आज ही अपने आपको अल्लाह की रहमत के साये में ले आएँ।

🎧 सुनें

📜 आयत 99-103 — अश-शुआरा

99وَمَا أَضَلَّنَا إِلَّا الْمُجْرِمُونَ
और हमको बस (उन) गुनाहगारों ने (जो मुझसे पहले हुए) गुमराह किया
100فَمَا لَنَا مِن شَافِعِينَ
तो अब तो न कोई (साहब) मेरी सिफारिश करने वाले हैं
101وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍ
और न कोई दिलबन्द दोस्त हैं
102فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
तो काश हमें अब दुनिया में दोबारा जाने का मौक़ा मिलता तो हम (ज़रुर) ईमान वालों से होते
103إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
इबराहीम के इस किस्से में भी यक़ीनन एक बड़ी इबरत है और इनमें से अक्सर ईमान लाने वाले थे भी नहीं
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अनुवाद — अश-शुआरा 101

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Tuesday, August 18, 2026

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