अश-शुआरा · 102/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ ۝١٠٢
Falaw anna lanaa karratan fanakoona minal mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
तो काश हमें अब दुनिया में दोबारा जाने का मौक़ा मिलता तो हम (ज़रुर) ईमान वालों से होते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • कर्रतन (कर्रा) — दुनिया में वापस लौटना, दोबारा जीवन में आना।
  • फ़नकूना — तो हम हो जाएँ।
  • मिन अल-मोमिनीन — ईमान लाने वालों में से।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस हालत का वर्णन करती है जब क़यामत के दिन काफ़िर और गुनाहगार लोग अपने अंजाम को देख लेंगे और उन्हें अपनी ग़लतियों का एहसास होगा। वे देखेंगे कि मोमिनीन किस तरह जन्नत की नेमतों से नवाज़े जा रहे हैं, और वे ख़ुद जहन्नम की तरफ़ ले जाए जा रहे हैं। उस वक़्त उनके दिलों में पछतावे की आग भड़केगी और वे तरसते हुए कहेंगे: "काश! हमें एक बार फिर दुनिया में भेज दिया जाता, तो हम सच्चे दिल से ईमान लाते और नेक अमल करते।"

यह उनकी आख़िरी तमन्ना होगी, लेकिन यह तमन्ना उस वक़्त बेकार होगी जब मौका हाथ से निकल चुका होगा। दुनिया में जब उनके पास रसूल आए, किताबें उतरीं, और सच्चाई उनके सामने आई, तो उन्होंने झुठलाया और मुँह मोड़ लिया। अब जब सच्चाई आँखों के सामने होगी, तो वे पछताएँगे, मगर पछतावे का वक़्त गुज़र चुका होगा।

यह आयत हमारे लिए एक बहुत बड़ी नसीहत है। अल्लाह ने हमें दुनिया में ज़िंदगी दी है, और हर दिन, हर घड़ी हमारे पास ईमान और नेक अमल का मौका है। हमें उस मौके को गंवाना नहीं चाहिए। आज हम जिस नेमत में जी रहे हैं — साँसें, सेहत, वक़्त, और ईमान — यह सब अल्लाह की तरफ़ से है। हमें चाहिए कि इन नेमतों का सही इस्तेमाल करें, नमाज़ पढ़ें, रोज़ा रखें, अच्छे काम करें, और अल्लाह की राह में दूसरों की मदद करें।

याद रखिए, यह दुनिया आज़माइश की जगह है। जो लोग यहाँ अल्लाह की इबादत करते हैं और उसके हुक्मों पर चलते हैं, वे क़यामत के दिन कामयाब होंगे। और जो लोग दुनिया की चमक-दमक में खो जाते हैं और अल्लाह को भूल जाते हैं, वे उस दिन पछताएँगे, लेकिन पछतावा उनके किसी काम न आएगा।

तो आओ, हम सब इस आयत से सबक लें और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की राह में लगाएँ। आज हमारे पास जो मौका है, उसे गंवाना नहीं चाहिए। कल का पछतावा आज के अमल से बेहतर है। अल्लाह हम सबको सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 100-104 — अश-शुआरा

100فَمَا لَنَا مِن شَافِعِينَ
तो अब तो न कोई (साहब) मेरी सिफारिश करने वाले हैं
101وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍ
और न कोई दिलबन्द दोस्त हैं
102فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
तो काश हमें अब दुनिया में दोबारा जाने का मौक़ा मिलता तो हम (ज़रुर) ईमान वालों से होते
103إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
इबराहीम के इस किस्से में भी यक़ीनन एक बड़ी इबरत है और इनमें से अक्सर ईमान लाने वाले थे भी नहीं
104وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ
और इसमे तो शक ही नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार (सब पर) ग़ालिब और बड़ा मेहरबान है
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अनुवाद — अश-शुआरा 102

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Tuesday, August 18, 2026

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