अश-शुआरा · 156/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابُ يَوْمٍ عَظِيمٍ ۝١٥٦
Wa laa tamassoohaa bisooo`in fa yaakhuzakum `azaabu Yawmin `Azeem
📖 हिंदी अर्थ
और इसको कोई तकलीफ़ न पहुँचाना वरना एक बड़े (सख्त) ज़ोर का अज़ाब तुम्हे ले डालेगा
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • तमस्सूहा – उसे छुओ या उसे नुकसान पहुँचाओ
  • बिसू' – बुराई, नुकसान, तकलीफ़ (जैसे मारना, ज़ख्मी करना, या वध करना)
  • अज़ाब – यातना, दंड
  • यौमिन अज़ीम – बड़े (भयानक) दिन की यातना

तफ़सीर:

हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को समझाया कि यह अल्लाह की भेजी हुई नाक़ा (ऊँटनी) है। यह अल्लाह का एक चमत्कार और निशानी है। उन्होंने साफ़ हिदायत दी कि इस नाक़ा के साथ किसी भी तरह की बुराई न करना — न उसे मारना, न उसे ज़ख्मी करना, न उसे सताना, न उसे उसके पानी के हिस्से से रोकना। अगर तुमने ऐसा किया, तो अल्लाह का अज़ाब तुम्हें अपनी लपेट में ले लेगा — ऐसे दिन का अज़ाब जो बहुत ही भयानक और सख्त होगा, जिसकी हिफ़्ज़त और शिद्दत की कोई इंतिहा नहीं।

यह चेतावनी सिर्फ़ उस वक़्त की क़ौम के लिए नहीं थी, बल्कि हर उस इंसान के लिए सबक़ है जो अल्लाह की निशानियों के साथ बुराई करता है। अल्लाह की हर निशानी — चाहे वह कोई जानवर हो, कोई इंसान हो, कोई रिज़्क़ हो, या कोई और नेमत — उसके साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए। अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करना और उन्हें नुकसान न पहुँचाना ही ईमान की निशानी है।

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह की हर चीज़ का एहतराम करना चाहिए। जो लोग अल्लाह की निशानियों का मज़ाक़ उड़ाते हैं या उन्हें नुकसान पहुँचाते हैं, वे अल्लाह के ग़ज़ब के हक़दार बनते हैं। लेकिन जो लोग अल्लाह की निशानियों का सम्मान करते हैं और उनके साथ भलाई करते हैं, उनके लिए अल्लाह की रहमत और बरकतें हैं।

याद रखिए, अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है। वह देर करता है, लेकिन भूलता नहीं। जब उसका अज़ाब आता है, तो कोई उसे टाल नहीं सकता। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह के हुक्मों का पालन करना चाहिए और उसकी निशानियों के साथ अच्छा सुलूक करना चाहिए। यही हमारी कामयाबी और नजात का ज़रिया है।

🎧 सुनें

📜 आयत 154-158 — अश-शुआरा

154مَا أَنتَ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُنَا فَأْتِ بِآيَةٍ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
तुम भी तो आख़िर हमारे ही ऐसे आदमी हो पस अगर तुम सच्चे हो तो कोई मौजिज़ा हमारे पास ला (दिखाओ)
155قَالَ هَٰذِهِ نَاقَةٌ لَّهَا شِرْبٌ وَلَكُمْ شِرْبُ يَوْمٍ مَّعْلُومٍ
सालेह ने कहा- यही ऊँटनी (मौजिज़ा) है एक बारी इसके पानी पीने की है और एक मुक़र्रर दिन तुम्हारे पीने का
156وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابُ يَوْمٍ عَظِيمٍ
और इसको कोई तकलीफ़ न पहुँचाना वरना एक बड़े (सख्त) ज़ोर का अज़ाब तुम्हे ले डालेगा
157فَعَقَرُوهَا فَأَصْبَحُوا نَادِمِينَ
इस पर भी उन लोगों ने उसके पाँव काट डाले और (उसको मार डाला) फिर ख़़ुद पशेमान हुए
158فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
फिर उन्हें अज़ाब ने ले डाला-बेशक इसमें यक़ीनन एक बड़ी इबरत है और इनमें के बहुतेरे ईमान लाने वाले भी न थे
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अनुवाद — अश-शुआरा 156

सूरा अश-शुआरा आयत 156 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और इसको कोई तकलीफ़ न पहुँचाना वरना एक बड़े (सख्त)…

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Tuesday, August 18, 2026

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