अश-शुआरा · 7/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَى الْأَرْضِ كَمْ أَنبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍ كَرِيمٍ ۝٧
Awa lam yaraw ilal ardi kam ambatnaa feehaa min kulli zawjin kareem
📖 हिंदी अर्थ
क्या इन लोगों ने ज़मीन की तरफ भी (ग़ौर से) नहीं देखा कि हमने हर रंग की उम्दा उम्दा चीजें उसमें किस कसरत से उगायी हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ज़ौज (زوج): यहाँ इसका अर्थ है प्रकार या क़िस्म।
  • करीम (كريم): अच्छा, सुंदर, लाभदायक और उत्तम।

तफ़सीर (व्याख्या):

क्या इन काफ़िरों ने धरती की ओर नज़र नहीं डाली? क्या उन्होंने उस ज़मीन को नहीं देखा जिसमें हमने हर प्रकार की अच्छी, सुंदर और लाभदायक वनस्पतियाँ उगाई हैं — जिनमें से कुछ इंसानों के खाने के काम आती हैं और कुछ जानवरों के चारे के लिए होती हैं? यह सब उगाना किसी और के बस की बात नहीं, बल्कि केवल अल्लाह ही की क़ुदरत (शक्ति) से संभव है।

यह देखना और सोचना अपने आप में एक बहुत बड़ी निशानी है जो अल्लाह की कमाल क़ुदरत और उसकी हिकमत (बुद्धिमत्ता) पर दलील देती है। जब कोई व्यक्ति इस पर ग़ौर करे तो उसे समझ आ जाता है कि यह सब कुछ अपने आप नहीं बन गया, बल्कि इसके पीछे एक महान रचयिता है जो सब कुछ जानता है और हर चीज़ पर पूर्ण अधिकार रखता है।

इसके बावजूद अधिकतर लोग ईमान नहीं लाते और इन निशानियों से आँखें बंद कर लेते हैं। लेकिन अल्लाह तआला अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, उसकी रहमत हर चीज़ को घेरे हुए है। वही सबसे अधिक शक्तिशाली है, और उसकी शक्ति के आगे कोई नहीं टिक सकता।

इस आयत से हमें सबक लेना चाहिए कि हम अपने चारों ओर फैली अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करें। धरती की हरियाली, फल-फूल, अनाज और हर प्रकार की वनस्पति — यह सब अल्लाह की रहमत और क़ुदरत का प्रमाण है। जो इंसान इन निशानियों पर विचार करता है, उसका ईमान मज़बूत होता है और वह अल्लाह के करीब आता है। अल्लाह ने यह सब कुछ हमारे लिए पैदा किया है ताकि हम उसका शुक्र अदा करें और उसकी इबादत करें।

याद रखिए, जो लोग इन निशानियों से सबक नहीं लेते, वे बड़े नुक़सान में हैं। लेकिन अल्लाह की रहमत के दरवाज़े हमेशा खुले हैं — जो भी सच्चे दिल से उसकी ओर लौटेगा, अल्लाह उसे माफ़ कर देगा और उसकी ज़िंदगी में बरकत डालेगा।

🎧 सुनें

📜 आयत 5-9 — अश-शुआरा

5وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍ مِّنَ الرَّحْمَٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا عَنْهُ مُعْرِضِينَ
और (लोगों का क़ायदा है कि) जब उनके पास कोई कोई नसीहत की बात ख़ुदा की तरफ से आयी तो ये लोग उससे मुँह फेरे बगैर नहीं रहे
6فَقَدْ كَذَّبُوا فَسَيَأْتِيهِمْ أَنبَاءُ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
उन लोगों ने झुठलाया ज़रुर तो अनक़रीब ही (उन्हें) इस (अज़ाब) की हक़ीकत मालूम हो जाएगी जिसकी ये लोग हँसी उड़ाया करते थे
7أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَى الْأَرْضِ كَمْ أَنبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍ كَرِيمٍ
क्या इन लोगों ने ज़मीन की तरफ भी (ग़ौर से) नहीं देखा कि हमने हर रंग की उम्दा उम्दा चीजें उसमें किस कसरत से उगायी हैं
8إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
यक़ीनन इसमें (भी क़ुदरत) ख़ुदा की एक बड़ी निशानी है मगर उनमें से अक्सर ईमान लाने वाले ही नहीं
9وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الرَّحِيمُ
और इसमें शक नहीं कि तेरा परवरदिगार यक़ीनन (हर चीज़ पर) ग़ालिब (और) मेहरबान है
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अनुवाद — अश-शुआरा 7

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Tuesday, August 18, 2026

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