अल-अंकबूत · 36/69
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अंकबूत
وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَارْجُوا الْيَوْمَ الْآخِرَ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ۝٣٦
Wa ilaa Madyana akhaahum Shu`ayban faqaala yaa qawmi`-budul laaha warjul yawmal aakhira wa laa ta`saw fil ardi mufsideen
📖 हिंदी अर्थ
और (हमने) मदियन के रहने वालों के पास उनके भाई शुएब को पैग़म्बर बनाकर भेजा उन्होंने (अपनी क़ौम से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा की इबादत करो और रोज़े आखेरत की उम्मीद रखो और रुए ज़मीन में फ़साद न फैलाते फिरो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مَدْيَنَ: मद्यन (एक क़बीले का नाम, जो हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम की क़ौम थी)
  • تَعْثَوْا: फ़साद फैलाना, ज़ुल्म और बिगाड़ पैदा करना (यह 'अस्य' से है, जिसका अर्थ है बिगाड़ना)
  • مُفْسِدِينَ: फ़साद करने वाले, नुक़्सान पहुँचाने वाले

तफ़सीर:

और हमने मद्यन की ओर उनके भाई शुएब (अलैहिस्सलाम) को भेजा। उन्होंने अपनी क़ौम से कहा: "ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह की इबादत करो और आख़िरत के दिन की उम्मीद रखो, और ज़मीन में फ़साद फैलाकर बिगाड़ मत पैदा करो।"

हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को दो बुनियादी बातों की नसीहत दी:

  1. अल्लाह की इबादत: सिर्फ़ अल्लाह ही की इबादत करो, उसका कोई शरीक न बनाओ। इबादत को सिर्फ़ उसी के लिए ख़ालिस रखो, क्योंकि उसके सिवा कोई माबूद नहीं।
  2. आख़िरत की उम्मीद: अपनी इबादतों और अच्छे कामों से आख़िरत के दिन का अज्र और सवाब की उम्मीद रखो। यानी अपने आमाल को इस नीयत से करो कि उसका इनाम अल्लाह के यहाँ मिलेगा।

फिर उन्होंने उन्हें ज़मीन में फ़साद फैलाने से रोका। "फ़साद" का मतलब सिर्फ़ ज़मीन को तबाह करना नहीं है, बल्कि गुनाह, ज़ुल्म, नाप-तौल में कमी, रिश्वत, धोखा और हर वो काम जो समाज में बिगाड़ पैदा करे, वो फ़साद है। उन्होंने कहा कि जो काम तुम कर रहे हो, उस पर क़ायम न रहो, बल्कि अल्लाह की तरफ़ रुजू करो और तौबा करो।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि एक सच्चे दावत देने वाले का तरीक़ा यही होता है कि वह लोगों को पहले तौहीद (अल्लाह की एकता) की तरफ़ बुलाए, फिर उन्हें आख़िरत की याद दिलाए, और साथ ही उन्हें बुराइयों और फ़साद से रोके। यह तरीक़ा आज भी हर मुसलमान के लिए नमूना है। हमें भी अपने समाज में अच्छाई का हुक्म देना चाहिए और बुराई से रोकना चाहिए, और याद रखना चाहिए कि अल्लाह की इबादत और आख़िरत की उम्मीद ही वो चीज़ है जो इंसान को फ़साद से बचाती है और उसे सीधे रास्ते पर चलाती है। अल्लाह से डरने वाला इंसान कभी ज़मीन में फ़साद नहीं फैलाता, बल्कि वह इंसानियत के लिए रहमत बनता है।



📜 आयत 34-38 — सूरा अल-अंकबूत

34إِنَّا مُنزِلُونَ عَلَىٰ أَهْلِ هَٰذِهِ الْقَرْيَةِ رِجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
हम यक़ीनन इसी बस्ती के रहने वालों पर चूँकि ये लोग बदकारियाँ करते रहे एक आसमानी अज़ाब नाज़िल करने वाले हैं
35وَلَقَد تَّرَكْنَا مِنْهَا آيَةً بَيِّنَةً لِّقَوْمٍ يَعْقِلُونَ
और हमने यक़ीनी उस (उलटी हुई बस्ती) में से समझदार लोगों के वास्ते (इबरत की) एक वाज़ेए व रौशन निशानी बाक़ी रखी है
36وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَارْجُوا الْيَوْمَ الْآخِرَ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
और (हमने) मदियन के रहने वालों के पास उनके भाई शुएब को पैग़म्बर बनाकर भेजा उन्होंने (अपनी क़ौम से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा की इबादत करो और रोज़े आखेरत की उम्मीद रखो और रुए ज़मीन में फ़साद न फैलाते फिरो
37فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ
तो उन लोगों ने शुऐब को झुठलाया पस ज़लज़ले (भूचाल) ने उन्हें ले डाला- तो वह लोग अपने घरों में औंधे ज़ानू के बल पड़े रह गए
38وَعَادًا وَثَمُودَ وَقَد تَّبَيَّنَ لَكُم مِّن مَّسَاكِنِهِمْ ۖ وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ السَّبِيلِ وَكَانُوا مُسْتَبْصِرِينَ
और क़ौम आद और समूद को (भी हलाक कर डाला) और (ऐ अहले मक्का) तुम को तो उनके (उजड़े हुए) घर भी (रास्ता आते जाते) मालूम हो चुके और शैतान ने उनकी नज़र में उनके कामों को अच्छा कर दिखाया था और उन्हें (सीधी) राह (चलने) से रोक दिया था हालॉकि वह बड़े होशियार थे
अल-अंकबूतकुरान सूची
69आयत
मक्कीअवतरण स्थान
36आयत

अनुवाद — अल-अंकबूत 36

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Thursday, October 1, 2026

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