अर-रूम · 55/60
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-रूम
وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُقْسِمُ الْمُجْرِمُونَ مَا لَبِثُوا غَيْرَ سَاعَةٍ ۚ كَذَٰلِكَ كَانُوا يُؤْفَكُونَ ۝٥٥
Wa Yawma taqoomus Saa`atu yuqsimul mujrimoona maa labisoo ghaira saa`ah; kazaalika kaanoo yu`fakoon
📖 हिंदी अर्थ
और जिस दिन क़यामत बरपा होगी तो गुनाहगार लोग कसमें खाएँगें कि वह (दुनिया में) घड़ी भर से ज्यादा नहीं ठहरे यूँ ही लोग (दुनिया में भी) इफ़तेरा परदाज़ियाँ करते रहे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يُقْسِمُ: क़सम खाते हैं, शपथ लेते हैं।
  • الْمُجْرِمُونَ: अपराधी, अर्थात मुशरिक (बहुदेववादी) और काफ़िर लोग।
  • مَا لَبِثُوا: वे (दुनिया या क़ब्र में) नहीं रहे।
  • غَيْرَ سَاعَةٍ: एक घंटे के अलावा, अर्थात बहुत थोड़े समय के सिवा।
  • يُؤْفَكُونَ: उन्हें (सत्य से) फेर दिया जाता था, या वे झूठ की ओर मोड़ दिए जाते थे।

तफ़सीर (व्याख्या):

जिस दिन क़ियामत (प्रलय) का दिन आएगा और अल्लाह तआला सभी लोगों को क़ब्रों से उठाएगा, उस दिन अपराधी और मुशरिक लोग क़समें खाकर कहेंगे कि हम (दुनिया या क़ब्र में) एक घंटे से ज़्यादा नहीं रहे। वे दुनिया की ज़िंदगी को बहुत छोटा और मामूली समझेंगे, क्योंकि जब वे आख़िरत के भयानक दृश्य देखेंगे और उसके सामने दुनिया की अवधि को महसूस करेंगे, तो उन्हें लगेगा कि उनका जीवन बहुत थोड़ा था। लेकिन उनकी यह क़सम झूठी होगी, क्योंकि वे जानते हैं कि उन्होंने दुनिया में काफ़ी लंबा समय बिताया था, परन्तु आख़िरत के सामने उसे बहुत कम महसूस करेंगे। यह उनका झूठ और धोखा होगा, जैसे वे दुनिया में भी झूठ बोलते थे और सत्य (हक़) से मुँह मोड़ते थे। उन्हें दुनिया में भी सत्य से फेर दिया जाता था, और वे अपनी ज़िद और अहंकार के कारण अल्लाह के रसूलों की बात नहीं मानते थे, इसलिए आज भी वे उसी झूठ और धोखे में हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की ज़िंदगी बहुत छोटी और अस्थायी है, और आख़िरत का दिन सच्चा और स्थायी है। हमें चाहिए कि हम इस छोटी सी ज़िंदगी में अल्लाह की इबादत करें, उसके आदेशों का पालन करें, और उसके रसूल (ﷺ) की सुन्नत पर चलें, ताकि उस दिन हमें शर्मिंदगी और पछतावा न उठाना पड़े। याद रखिए, आज का हर पल कीमती है, और क़ियामत के दिन हमें अपने हर अमल का हिसाब देना है। अल्लाह तआला हमें सत्य पर चलने की तौफ़ीक़ दे और हमें उन लोगों में से न बनाए जो उस दिन झूठी क़समें खाकर शर्मिंदा होंगे। आमीन।



📜 आयत 53-57 — सूरा अर-रूम

53وَمَا أَنتَ بِهَادِ الْعُمْيِ عَن ضَلَالَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ
और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से (फेरकर) राह पर ला सकते हो तो तुम तो बस उन्हीं लोगों को सुना (समझा) सकते हो जो हमारी आयतों को दिल से मानें फिर यही लोग इस्लाम लाने वाले हैं
54۞ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن ضَعْفٍ ثُمَّ جَعَلَ مِن بَعْدِ ضَعْفٍ قُوَّةً ثُمَّ جَعَلَ مِن بَعْدِ قُوَّةٍ ضَعْفًا وَشَيْبَةً ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۖ وَهُوَ الْعَلِيمُ الْقَدِيرُ
खुदा ही तो है जिसने तुम्हें (एक निहायत) कमज़ोर चीज़ (नुत्फे) से पैदा किया फिर उसी ने (तुम में) बचपने की कमज़ोरी के बाद (शबाब की) क़ूवत अता की फिर उसी ने (तुममें जवानी की) क़ूवत के बाद कमज़ोरी और बुढ़ापा पैदा कर दिया वह जो चाहता पैदा करता है-और वही बड़ा वाकिफकार और (हर चीज़ पर) क़ाबू रखता है
55وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يُقْسِمُ الْمُجْرِمُونَ مَا لَبِثُوا غَيْرَ سَاعَةٍ ۚ كَذَٰلِكَ كَانُوا يُؤْفَكُونَ
और जिस दिन क़यामत बरपा होगी तो गुनाहगार लोग कसमें खाएँगें कि वह (दुनिया में) घड़ी भर से ज्यादा नहीं ठहरे यूँ ही लोग (दुनिया में भी) इफ़तेरा परदाज़ियाँ करते रहे
56وَقَالَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ وَالْإِيمَانَ لَقَدْ لَبِثْتُمْ فِي كِتَابِ اللَّهِ إِلَىٰ يَوْمِ الْبَعْثِ ۖ فَهَٰذَا يَوْمُ الْبَعْثِ وَلَٰكِنَّكُمْ كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
और जिन लोगों को (ख़ुदा की बारगाह से) इल्म और ईमान दिया गया है जवाब देगें कि (हाए) तुम तो ख़ुदा की किताब के मुताबिक़ रोज़े क़यामत तक (बराबर) ठहरे रहे फिर ये तो क़यामत का ही दिन है मगर तुम लोग तो उसका यक़ीन ही न रखते थे
57فَيَوْمَئِذٍ لَّا يَنفَعُ الَّذِينَ ظَلَمُوا مَعْذِرَتُهُمْ وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ
तो उस दिन सरकश लोगों को न उनकी उज्र माअज़ेरत कुछ काम आएगी और न उनकी सुनवाई होगी
अर-रूमकुरान सूची
60आयत
मक्कीअवतरण स्थान
55आयत

अनुवाद — अर-रूम 55

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Thursday, October 1, 2026

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