ये मुशरिकीन (बहुदेववादी) मज़ाक़ और उपहास के अंदाज़ में कहते हैं कि "वह वादा कब पूरा होगा जिसकी तुम हमें धमकी देते हो? अगर तुम सच्चे हो तो बताओ कि वह समय कब आएगा?" वे अल्लाह के अज़ाब और क़ियामत के दिन को दूर की बात समझते थे और इसलिए मज़ाक़ उड़ाते थे। उनका यह सवाल वास्तव में सच्चाई को मानने से इनकार और रसूलुल्लाह ﷺ तथा मोमिनीन को नीचा दिखाने की कोशिश थी।
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का वादा सत्य है और उसका पूरा होना निश्चित है। जो लोग मज़ाक़ उड़ाते हैं, वे केवल अपने आप को नुक़सान पहुँचाते हैं। अल्लाह की ओर से आने वाला अज़ाब और क़ियामत का दिन अवश्य आएगा, चाहे वे मानें या न मानें। हमें चाहिए कि हम अल्लाह के वादों पर पूरा यक़ीन रखें और उसकी आज्ञाओं का पालन करें। याद रखें, अल्लाह का हर वादा सच्चा है और वह अपने वादे को पूरा करके रहेगा। यही ईमान की निशानी है कि इंसान अल्लाह के वादों पर दिल से भरोसा करे और उन्हें मज़ाक़ न समझे।
(ऐ रसूल तुम कह दो कि जिनको तुम ने खुदा का शरीक बनाकर) खुदा के साथ मिलाया है ज़रा उन्हें मुझे भी तो दिखा दो हरगिज़ (कोई शरीक नहीं) बल्कि खुदा ग़ालिब हिकमत वाला है
(ऐ रसूल) हमने तुमको तमाम (दुनिया के) लोगों के लिए (नेकों को बेहश्त की) खुशखबरी देने वाला और (बन्दों को अज़ाब से) डराने वाला (पैग़म्बर) बनाकर भेजा मगर बहुतेरे लोग (इतना भी) नहीं जानते
और जो लोग काफिर हों बैठे कहते हैं कि हम तो न इस क़ुरान पर हरगिज़ ईमान लाएँगे और न उस (किताब) पर जो इससे पहले नाज़िल हो चुकी और (ऐ रसूल तुमको बहुत ताज्जुब हो) अगर तुम देखो कि जब ये ज़ालिम क़यामत के दिन अपने परवरदिगार के सामने खड़े किए जायेंगे (और) उनमें का एक दूसरे की तरफ (अपनी) बात को फेरता होगा कि कमज़ोर अदना (दरजे के) लोग बड़े (सरकश) लोगों से कहते होगें कि अगर तुम (हमें) न (बहकाए) होते तो हम ज़रूर ईमानवाले होते (इस मुसीबत में न पड़ते)
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