साद · 39/88
अनुवाद उच्चारण — सूरा साद
هَٰذَا عَطَاؤُنَا فَامْنُنْ أَوْ أَمْسِكْ بِغَيْرِ حِسَابٍ ۝٣٩
Haazaa `ataaa`unaa famnun aw amsik bighairi hisaab
📖 हिंदी अर्थ
ऐ सुलेमान ये हमारी बेहिसाब अता है पस (उसे लोगों को देकर) एहसान करो या (सब) अपने ही पास रखो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • عَطَاؤُنَا – हमारा उपहार, हमारी ओर से दिया गया।
  • فَامْنُنْ – तो तुम दो (अर्थात जिसे चाहो दे दो)।
  • أَمْسِكْ – रोको (अर्थात जिसे चाहो न दो)।
  • بِغَيْرِ حِسَابٍ – बिना किसी हिसाब के, बिना किसी पूछ-गवाह के।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के सम्मान में कही गई है। अल्लाह तआला ने उन्हें एक ऐसा अद्भुत साम्राज्य और शक्ति प्रदान की थी जो किसी और को नहीं दी गई थी। उनके आदेश पर हवाएँ चलती थीं, जिन्नात उनके लिए काम करते थे, कुछ निर्माण करते थे, कुछ समुद्र में गोता लगाकर मोती निकालते थे, और कुछ को ज़ंजीरों में जकड़ दिया गया था। यह सब कुछ अल्लाह की ओर से एक विशेष उपहार था।

इसी संदर्भ में अल्लाह तआला फरमाता है: "यह हमारा उपहार है, ऐ सुलेमान! तो तुम जिसे चाहो दो और जिससे चाहो रोको, इस पर तुमसे कोई हिसाब नहीं लिया जाएगा।" यानी अल्लाह ने उन्हें पूर्ण अधिकार दिया था कि वे अपनी इच्छा से दें या न दें, और यह उनकी महानता और अल्लाह की ओर से विशेष कृपा थी।

इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अल्लाह तआला अपने नेक बंदों को जो नेमतें देता है, वह उनके लिए आज़माइश भी होती हैं और सम्मान भी। हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने इस अधिकार का उपयोग पूरी न्याय और हिकमत के साथ किया, और हमेशा अल्लाह के शुक्रगुज़ार रहे।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह जब किसी को धन, अधिकार या शक्ति देता है, तो उसे चाहिए कि वह इसे अल्लाह की राह में खर्च करे, ज़रूरतमंदों की मदद करे, और किसी पर ज़ुल्म न करे। साथ ही, यह भी याद रखे कि यह सब अल्लाह की देन है, और उसे इसका हिसाब देना है। लेकिन हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के लिए यह एक विशेष मर्तबा था कि उन्हें बिना हिसाब के देने और रोकने की इजाज़त दी गई।

इस आयत में एक और बात समझने की है कि अल्लाह तआला अपने प्यारे नबियों को जो कुछ देता है, वह उनके लिए दुनिया में भी नेमत है और आख़िरत में भी। हमें चाहिए कि हम अल्लाह की दी हुई नेमतों पर शुक्र करें और उन्हें अल्लाह की राह में खर्च करें, ताकि हम भी अल्लाह के प्यारे बंदों में शामिल हो सकें।



📜 आयत 37-41 — सूरा साद

37وَالشَّيَاطِينَ كُلَّ بَنَّاءٍ وَغَوَّاصٍ
और (इसी तरह) जितने शयातीन (देव) इमारत बनाने वाले और ग़ोता लगाने वाले थे
38وَآخَرِينَ مُقَرَّنِينَ فِي الْأَصْفَادِ
सबको (ताबेए कर दिया और इसके अलावा) दूसरे देवों को भी जो ज़ंज़ीरों में जकड़े हुए थे
39هَٰذَا عَطَاؤُنَا فَامْنُنْ أَوْ أَمْسِكْ بِغَيْرِ حِسَابٍ
ऐ सुलेमान ये हमारी बेहिसाब अता है पस (उसे लोगों को देकर) एहसान करो या (सब) अपने ही पास रखो
40وَإِنَّ لَهُ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَآبٍ
और इसमें शक नहीं कि सुलेमान की हमारी बारगाह में कुर्ब व मज़ेलत और उमदा जगह है
41وَاذْكُرْ عَبْدَنَا أَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ أَنِّي مَسَّنِيَ الشَّيْطَانُ بِنُصْبٍ وَعَذَابٍ
और (ऐ रसूल) हमारे (ख़ास) बन्दे अय्यूब को याद करो जब उन्होंने अपने परवरगिार से फरियाद की कि मुझको शैतान ने बहुत अज़ीयत और तकलीफ पहुँचा रखी है
सादकुरान सूची
88आयत
मक्कीअवतरण स्थान
39आयत

अनुवाद — साद 39

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Friday, October 2, 2026

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