अन-निसा · 116/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا ۝١١٦
Innal laaha laa yaghfiru ai yushraka bihee wayaghfiru maa doona zaalika limai yashaaa`; wa mai yushrik billaahi faqad dalla dalaalam ba`eedaa
📖 हिंदी अर्थ
ख़ुदा बेशक उसको तो नहीं बख्शता कि उसका कोई और शरीक बनाया जाए हॉ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे बख्श दे और (माज़ अल्लाह) जिसने किसी को ख़ुदा का शरीक बनाया तो वह बस भटक के बहुत दूर जा पड़ा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا يَغْفِرُ – क्षमा नहीं करता
  • أَن يُشْرَكَ بِهِ – उसके साथ किसी को साझी ठहराना (शिर्क करना)
  • مَا دُونَ ذَٰلِكَ – उससे कम (अर्थात शिर्क के अलावा अन्य पाप)
  • لِمَن يَشَاءُ – जिसके लिए चाहता है
  • ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا – बहुत दूर की गुमराही में भटक गया

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों को सबसे बड़ी सच्चाई से अवगत करा रहे हैं कि शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराना) वह इकलौता पाप है जिसे अल्लाह कभी क्षमा नहीं करेगा। यह अल्लाह की रहमत और उसके न्याय दोनों का अद्भुत संगम है। अल्लाह ने अपने बंदों पर यह बड़ा एहसान किया है कि शिर्क के अलावा अन्य सभी पापों को वह अपनी इच्छा और रहमत से क्षमा कर सकता है। यह अल्लाह की असीम दया का प्रमाण है कि उसने गुनाहगार बंदों के लिए तौबा (पश्चाताप) का दरवाजा खुला रखा है।

लेकिन शिर्क की स्थिति यह है कि जो व्यक्ति अल्लाह के साथ किसी और को पूज्य बनाता है, वह सृष्टिकर्ता और सृष्टि को एक समान कर देता है। यह सबसे बड़ा अन्याय और सबसे गहरी गुमराही है। ऐसा व्यक्ति सत्य से इतना दूर भटक जाता है कि उसके लिए सीधे रास्ते पर लौटना अत्यंत कठिन हो जाता है। वह हर भलाई से दूर हो जाता है और उसकी सारी नेकियाँ बेकार हो जाती हैं।

इस आयत में अल्लाह ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि शिर्क करने वाले के लिए जहन्नम (नरक) में हमेशा रहना है। यह अल्लाह का फैसला है जो उसकी हिकमत (बुद्धिमत्ता) और अदल (न्याय) पर आधारित है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें अल्लाह की रहमत की ओर बुलाती है। अल्लाह ने अपने बंदों पर यह बड़ा एहसान किया है कि शिर्क के अलावा हर गुनाह की क्षमा की उम्मीद रखी है। यह हमें सिखाता है कि हमें कभी अल्लाह की रहमत से निराश नहीं होना चाहिए। चाहे हमसे कितने ही गुनाह हुए हों, अल्लाह की दया का दामन हमेशा खुला है। लेकिन साथ ही यह भी चेतावनी है कि शिर्क से बचें, क्योंकि यही वह चीज़ है जो इंसान को अल्लाह की रहमत से हमेशा के लिए वंचित कर देती है। अल्लाह की तौहीद (एकता) को अपनाकर हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं और उसकी रहमत के हकदार बन सकते हैं। यही सच्ची कामयाबी और सच्चा मार्गदर्शन है।

🎧 सुनें

📜 आयत 114-118 — अन-निसा

114۞ لَّا خَيْرَ فِي كَثِيرٍ مِّن نَّجْوَاهُمْ إِلَّا مَنْ أَمَرَ بِصَدَقَةٍ أَوْ مَعْرُوفٍ أَوْ إِصْلَاحٍ بَيْنَ النَّاسِ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّهِ فَسَوْفَ نُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا
(ऐ रसूल) उनके राज़ की बातों में अक्सर में भलाई (का तो नाम तक) नहीं मगर (हॉ) जो शख्स किसी को सदक़ा देने या अच्छे काम करे या लोगों के दरमियान मेल मिलाप कराने का हुक्म दे (तो अलबत्ता एक बात है) और जो शख्स (महज़) ख़ुदा की ख़ुशनूदी की ख्वाहिश में ऐसे काम करेगा तो हम अनक़रीब ही उसे बड़ा अच्छा बदला अता फरमाएंगे
115وَمَن يُشَاقِقِ الرَّسُولَ مِن بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُ الْهُدَىٰ وَيَتَّبِعْ غَيْرَ سَبِيلِ الْمُؤْمِنِينَ نُوَلِّهِ مَا تَوَلَّىٰ وَنُصْلِهِ جَهَنَّمَ ۖ وَسَاءَتْ مَصِيرًا
और जो शख्स राहे रास्त के ज़ाहिर होने के बाद रसूल से सरकशी करे और मोमिनीन के तरीक़े के सिवा किसी और राह पर चले तो जिधर वह फिर गया है हम भी उधर ही फेर देंगे और (आख़िर) उसे जहन्नुम में झोंक देंगे और वह तो बहुत ही बुरा ठिकाना
116إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا
ख़ुदा बेशक उसको तो नहीं बख्शता कि उसका कोई और शरीक बनाया जाए हॉ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे बख्श दे और (माज़ अल्लाह) जिसने किसी को ख़ुदा का शरीक बनाया तो वह बस भटक के बहुत दूर जा पड़ा
117إِن يَدْعُونَ مِن دُونِهِ إِلَّا إِنَاثًا وَإِن يَدْعُونَ إِلَّا شَيْطَانًا مَّرِيدًا
मुशरेकीन ख़ुदा को छोड़कर बस औरतों ही की परसतिश करते हैं (यानी बुतों की जो उनके) ख्याल में औरतें हैं (दर हक़ीक़त) ये लोग सरकश शैतान की परसतिश करते हैं
118لَّعَنَهُ اللَّهُ ۘ وَقَالَ لَأَتَّخِذَنَّ مِنْ عِبَادِكَ نَصِيبًا مَّفْرُوضًا
जिसपर ख़ुदा ने लानत की है और जिसने (इब्तिदा ही में) कहा था कि (ख़ुदावन्दा) मैं तेरे बन्दों में से कुछ ख़ास लोगों को (अपनी तरफ) ज़रूर ले लूंगा
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अनुवाद — अन-निसा 116

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Tuesday, August 18, 2026

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