अन-निसा · 137/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ ازْدَادُوا كُفْرًا لَّمْ يَكُنِ اللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ سَبِيلًا ۝١٣٧
Innal lazeena aamanoo summa kafaroo summa aamanoo summa kafaroo summaz daado kufral lam yakunil laahu liyaghfira lahum wa laa liyahdiyahum sabeelaa
📖 हिंदी अर्थ
बेशक जो लोग ईमान लाए उसके बाद फ़िर काफ़िर हो गए फिर ईमान लाए और फिर उसके बाद काफ़िर हो गये और कुफ़्र में बढ़ते चले गए तो ख़ुदा उनकी मग़फ़िरत करेगा और न उन्हें राहे रास्त की हिदायत ही करेगा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ثُمَّ ازْدَادُوا كُفْرًا: फिर वे कुफ्र में बढ़ते गए, यानी कुफ्र पर अड़े रहे और उसी हाल में मर गए।
  • لَمْ يَكُنِ اللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ: अल्लाह उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा।
  • وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ سَبِيلًا: और न ही उन्हें किसी सीधे रास्ते (हिदायत) की तरफ ले जाएगा।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के बारे में बताती है जिन्होंने ईमान लाने के बाद कुफ्र किया, फिर दोबारा ईमान लाए, फिर दोबारा कुफ्र किया, और आखिरकार कुफ्र ही पर जमे रहे और उसी हालत में दुनिया से चले गए। अल्लाह तआला फरमाता है कि ऐसे लोगों के लिए माफी का कोई रास्ता नहीं, और न ही अल्लाह उन्हें हिदायत की तरफ ले जाएगा, क्योंकि उन्होंने खुद अपनी आँखों से सच्चाई देखने के बाद उसे ठुकराया और जानबूझकर गुमराही को अपना लिया।

यह आयत उन लोगों के बारे में है जो ईमान और कुफ्र के बीच झूलते रहे, जैसे मुनाफिक़ीन (दिखावटी मुसलमान) या वे लोग जिन्होंने इस्लाम कबूल किया, फिर उसे छोड़ दिया, फिर लौटे, फिर छोड़ दिया—और आखिरकार कुफ्र ही पर मर गए। ऐसे लोगों के लिए तौबा (पश्चाताप) का दरवाजा उनकी मौत के बाद बंद हो जाता है, और अल्लाह की माफी उनके हिस्से में नहीं आती।

इस आयत से हमें एक बहुत बड़ा सबक मिलता है: ईमान की राह पर साबित क़दम रहना चाहिए। जो लोग बार-बार ईमान और कुफ्र के बीच झूलते हैं, वे अपने दिल को सच्चाई से दूर कर लेते हैं, यहाँ तक कि उनका दिल सच्चाई को कबूल करने की काबिलियत ही खो देता है। अल्लाह तआला हमें सीधे रास्ते पर चलने की तौफीक दे और हमें उन लोगों में से न बनाए जो सच्चाई को जानकर भी उससे मुँह मोड़ लेते हैं। यह आयत हमें चेतावनी देती है कि ईमान की नेअमत (अल्लाह का तोहफा) को हल्का न समझें, और जब सच्चाई सामने आ जाए तो उसे पकड़ लें, क्योंकि यही कामयाबी का रास्ता है। अल्लाह हमें हिदायत पर साबित क़दम रखे और हमारे दिलों को ईमान की मिठास से भर दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 135-139 — अन-निसा

135۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ أَوِ الْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ ۚ إِن يَكُنْ غَنِيًّا أَوْ فَقِيرًا فَاللَّهُ أَوْلَىٰ بِهِمَا ۖ فَلَا تَتَّبِعُوا الْهَوَىٰ أَن تَعْدِلُوا ۚ وَإِن تَلْوُوا أَوْ تُعْرِضُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا
ऐ ईमानवालों मज़बूती के साथ इन्साफ़ पर क़ायम रहो और ख़ुदा के लये गवाही दो अगरचे (ये गवाही) ख़ुद तुम्हारे या तुम्हारे मॉ बाप या क़राबतदारों के लिए खिलाफ़ (ही क्यो) न हो ख्वाह मालदार हो या मोहताज (क्योंकि) ख़ुदा तो (तुम्हारी बनिस्बत) उनपर ज्यादा मेहरबान है तो तुम (हक़ से) कतराने में ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और अगर घुमा फिरा के गवाही दोगे या बिल्कुल इन्कार करोगे तो (याद रहे जैसी करनी वैसी भरनी क्योंकि) जो कुछ तुम करते हो ख़ुद उससे ख़ूब वाक़िफ़ है
136يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا آمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي نَزَّلَ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي أَنزَلَ مِن قَبْلُ ۚ وَمَن يَكْفُرْ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا بَعِيدًا
ऐ ईमानवालों ख़ुदा और उसके रसूल (मोहम्मद) पर और उसकी किताब पर जो उसने अपने रसूल (मोहम्मद) पर नाज़िल की है और उस किताब पर जो उसने पहले नाज़िल की ईमान लाओ और (ये भी याद रहे कि) जो शख्स ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और रोज़े आख़िरत का मुन्किर हुआ तो वह राहे रास्त से भटक के जूर जा पड़ा
137إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ آمَنُوا ثُمَّ كَفَرُوا ثُمَّ ازْدَادُوا كُفْرًا لَّمْ يَكُنِ اللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ سَبِيلًا
बेशक जो लोग ईमान लाए उसके बाद फ़िर काफ़िर हो गए फिर ईमान लाए और फिर उसके बाद काफ़िर हो गये और कुफ़्र में बढ़ते चले गए तो ख़ुदा उनकी मग़फ़िरत करेगा और न उन्हें राहे रास्त की हिदायत ही करेगा
138بَشِّرِ الْمُنَافِقِينَ بِأَنَّ لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
(ऐ रसूल) मुनाफ़िक़ों को ख़ुशख़बरी दे दो कि उनके लिए ज़रूर दर्दनाक अज़ाब है
139الَّذِينَ يَتَّخِذُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۚ أَيَبْتَغُونَ عِندَهُمُ الْعِزَّةَ فَإِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا
जो लोग मोमिनों को छोड़कर काफ़िरों को अपना सरपरस्त बनाते हैं क्या उनके पास इज्ज़त (व आबरू) की तलाश करते हैं इज्ज़त सारी बस ख़ुदा ही के लिए ख़ास है
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अनुवाद — अन-निसा 137

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Tuesday, August 18, 2026

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