लेकिन (ऐ रसूल) उनमें से जो लोग इल्म (दीन) में बड़े मज़बूत पाए पर फ़ायज़ हैं वह और ईमान वाले तो जो (किताब) तुमपर नाज़िल हुई है (सब पर ईमान रखते हैं) और से नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात अदा करते हैं और ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत का यक़ीन रखते हैं ऐसे ही लोगों को हम अनक़रीब बहुत बड़ा अज्र अता फ़रमाएंगे
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مگر جو لوگ ان میں سے علم میں پکے ہیں اور جو مومن ہیں وہ اس (کتاب) پر جو تم پر نازل ہوئی اور جو (کتابیں) تم سے پہلے نازل ہوئیں (سب پر) ایمان رکھتے ہیں اور نماز پڑھتے ہیں اور زکوٰة دیتے ہیں اور خدا اور روز آخرت کو مانتے ہیں۔ ان کو ہم عنقریب اجر عظیم دیں گے
लेकिन (ऐ रसूल) उनमें से जो लोग इल्म (दीन) में बड़े मज़बूत पाए पर फ़ायज़ हैं वह और ईमान वाले तो जो (किताब) तुमपर नाज़िल हुई है (सब पर ईमान रखते हैं) और से नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात अदा करते हैं और ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत का यक़ीन रखते हैं ऐसे ही लोगों को हम अनक़रीब बहुत बड़ा अज्र अता फ़रमाएंगे
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
رَاسِخُونَ: ज्ञान में गहरे पैठ रखने वाले, पक्के और स्थिर लोग।
الْمُقِيمِينَ الصَّلَاةَ: नमाज़ को उसके नियमों और समय के साथ स्थापित करने वाले।
الْمُؤْتُونَ الزَّكَاةَ: ज़कात (अनिवार्य दान) देने वाले।
الْيَوْمِ الْآخِرِ: क़ियामत का दिन, हिसाब और बदले का दिन।
أَجْرًا عَظِيمًا: बहुत बड़ा प्रतिफल, यानी जन्नत।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला उन लोगों की प्रशंसा कर रहा है जो सच्चे ज्ञान और ईमान के साथ अपने दीन पर क़ायम हैं। यह उन यहूदियों के विपरीत है जिनका ज़िक्र पिछली आयतों में किया गया था, जिन्होंने अल्लाह की आयतों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और सच्चाई से मुँह मोड़ लिया। अल्लाह फ़रमाता है: लेकिन उनमें से जो लोग ज्ञान में गहरे और पक्के हैं — जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथी — और जो सच्चे मोमिन हैं (चाहे वे मुहाजिरीन हों या अंसार), वे उस चीज़ पर ईमान लाते हैं जो आप (ऐ रसूल) पर उतारी गई, यानी क़ुरआन, और उन सब चीज़ों पर भी ईमान लाते हैं जो आपसे पहले उतारी गईं, जैसे तौरात और इंजील। वे नमाज़ को उसके पूरे नियमों और समय के साथ क़ायम करते हैं, और अपने माल की ज़कात अदा करते हैं। वे अल्लाह पर ईमान रखते हैं कि वही अकेला पूजा के योग्य है, उसका कोई साझीदार नहीं, और वे आख़िरत के दिन पर भी पूरा विश्वास रखते हैं — कि मरने के बाद दोबारा जीवित होना है, हिसाब होगा और अच्छे-बुरे कर्मों का बदला मिलेगा। यही लोग हैं जिन्हें अल्लाह बहुत बड़ा प्रतिफल देगा, और वह प्रतिफल जन्नत है — जो हमेशा रहने वाली है और जिसमें हर तरह की नेमतें हैं।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
सच्चा ज्ञान (इल्म) इंसान को अल्लाह की तरफ़ ले जाता है और उसे सही रास्ते पर स्थिर रखता है। ज्ञान केवल दुनिया के लिए नहीं, बल्कि दीन की समझ और अल्लाह की पहचान के लिए भी होना चाहिए।
ईमान का तक़ाज़ा है कि इंसान अल्लाह की सारी किताबों पर ईमान लाए — बिना किसी भेदभाव के — और उन सबको सच्चा माने।
ईमान के साथ अमल (नेक कर्म) ज़रूरी है। सिर्फ़ ज़ुबान से ईमान काफ़ी नहीं, बल्कि नमाज़ क़ायम करना और ज़कात देना ईमान की निशानी है।
अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान इंसान को हर अच्छे काम की तरफ़ प्रेरित करता है और बुरे कामों से रोकता है।
अल्लाह का वादा है कि जो लोग ईमान और अच्छे कर्मों को जोड़ते हैं, उन्हें बहुत बड़ा प्रतिफल मिलेगा — यह अल्लाह की रहमत और करम का सबूत है।
ग़रज़ यहूदियों की (उन सब) शरारतों और गुनाह की वजह से हमने उनपर वह साफ़ सुथरी चीजें ज़ो उनके लिए हलाल की गयी थीं हराम कर दी और उनके ख़ुदा की राह से बहुत से लोगों को रोकने कि वजह से भी
और बावजूद मुमानिअत सूद खा लेने और नाहक़ ज़बरदस्ती लोगों के माल खाने की वजह से उनमें से जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया उनके वास्ते हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है
लेकिन (ऐ रसूल) उनमें से जो लोग इल्म (दीन) में बड़े मज़बूत पाए पर फ़ायज़ हैं वह और ईमान वाले तो जो (किताब) तुमपर नाज़िल हुई है (सब पर ईमान रखते हैं) और से नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात अदा करते हैं और ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत का यक़ीन रखते हैं ऐसे ही लोगों को हम अनक़रीब बहुत बड़ा अज्र अता फ़रमाएंगे
(ऐ रसूल) हमने तुम्हारे पास (भी) तो इसी तरह 'वही' भेजी जिस तरह नूह और उसके बाद वाले पैग़म्बरों पर भेजी थी और जिस तरह इबराहीम और इस्माइल और इसहाक़ और याक़ूब और औलादे याक़ूब व ईसा व अय्यूब व युनुस व हारून व सुलेमान के पास 'वही' भेजी थी और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता की
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