अन-निसा · 40/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ ۖ وَإِن تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا وَيُؤْتِ مِن لَّدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًا ۝٤٠
Innal laaha laa yazlimu misqaala zarratinw wa in taku hasanatany yudaa`ifhaa wa yu`ti mil ladunhu ajran `azeemaa
📖 हिंदी अर्थ
ख़ुदा तो हरगिज़ ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं करता बल्कि अगर ज़र्रा बराबर भी किसी की कोई नेकी हो तो उसको दूना करता है और अपनी तरफ़ से बड़ा सवाब अता फ़रमाता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مِثْقَالَ ذَرَّةٍ: एक छोटे से चींटी (लाल चींटी) के बराबर वज़न, यानी बहुत ही सूक्ष्म मात्रा।
  • يُضَاعِفْهَا: उसे कई गुना बढ़ा देता है।
  • مِن لَّدُنْهُ: अपनी ओर से, अपने विशेष अनुग्रह से।
  • أَجْرًا عَظِيمًا: बहुत बड़ा प्रतिफल (जो जन्नत है)।

विस्तृत व्याख्या:

अल्लाह तआला अपने बंदों पर बिल्कुल भी ज़ुल्म नहीं करता। वह किसी के अच्छे कर्मों को कम नहीं करता, न ही किसी के बुरे कर्मों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। यहाँ तक कि अगर किसी ने एक छोटे से चींटी के बराबर भी नेकी की हो, तो अल्लाह उसे बरकत देकर कई गुना बढ़ा देता है। यानी वह एक छोटी सी नेकी को भी बहुत बड़ा अज्र (प्रतिफल) में बदल देता है। और इस पर भी वह अपनी ओर से, अपने विशेष अनुग्रह से, एक और बड़ा इनाम देता है — जो जन्नत है। यह अल्लाह का असीम दान और कृपा है कि वह न केवल नेकियों को कई गुना बढ़ाता है, बल्कि अपनी ओर से और भी अधिक देता है।


शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह की न्यायप्रियता: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला पूर्ण न्याय करने वाला है। वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, इसलिए हमें उस पर पूरा भरोसा रखना चाहिए और उसके फैसलों पर संतुष्ट रहना चाहिए।
  2. छोटी नेकियों की अहमियत: अगर एक छोटी सी नेकी भी अल्लाह को पसंद आ जाए, तो वह उसे कई गुना बढ़ा देता है। इसलिए हमें किसी भी अच्छे काम को छोटा नहीं समझना चाहिए — एक मुस्कान, एक अच्छा शब्द, या किसी की मदद का छोटा सा काम भी बहुत बड़ा इनाम ला सकता है।
  3. अल्लाह की असीम दया: अल्लाह सिर्फ न्याय ही नहीं करता, बल्कि अपनी दया और कृपा से और भी अधिक देता है। यह हमें उसकी रहमत की ओर आकर्षित करता है और उससे प्रेम करने की प्रेरणा देता है।
  4. आशावाद और उम्मीद: यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की रहमत से कभी निराश नहीं होना चाहिए। चाहे हमारे अच्छे काम कितने ही कम हों, अल्लाह उन्हें कबूल करके बड़ा इनाम दे सकता है। यह हमें अच्छे काम करते रहने की ताकत देता है।
  5. अंतिम प्रतिफल की सच्चाई: यह आयत हमें याद दिलाती है कि असली इनाम आख़िरत में मिलेगा — जन्नत। इसलिए दुनिया के छोटे-मोटे फायदों के लिए अपनी नेकियों को नहीं बेचना चाहिए, बल्कि उस बड़े इनाम की तरफ देखना चाहिए जो अल्लाह ने अपने नेक बंदों के लिए तैयार किया है।
🎧 सुनें

📜 आयत 38-42 — अन-निसा

38وَالَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ رِئَاءَ النَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَلَا بِالْيَوْمِ الْآخِرِ ۗ وَمَن يَكُنِ الشَّيْطَانُ لَهُ قَرِينًا فَسَاءَ قَرِينًا
और जो लोग महज़ लोगों को दिखाने के वास्ते अपने माल ख़र्च करते हैं और न खुदा ही पर ईमान रखते हैं और न रोजे आख़ेरत पर ख़ुदा भी उनके साथ नहीं क्योंकि उनका साथी तो शैतान है और जिसका साथी शैतान हो तो क्या ही बुरा साथी है
39وَمَاذَا عَلَيْهِمْ لَوْ آمَنُوا بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَأَنفَقُوا مِمَّا رَزَقَهُمُ اللَّهُ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِهِمْ عَلِيمًا
अगर ये लोग ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाते और जो कुछ ख़ुदा ने उन्हें दिया है उसमें से राहे ख़ुदा में ख़र्च करते तो उन पर क्या आफ़त आ जाती और ख़ुदा तो उनसे ख़ूब वाक़िफ़ है
40إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ ۖ وَإِن تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا وَيُؤْتِ مِن لَّدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًا
ख़ुदा तो हरगिज़ ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं करता बल्कि अगर ज़र्रा बराबर भी किसी की कोई नेकी हो तो उसको दूना करता है और अपनी तरफ़ से बड़ा सवाब अता फ़रमाता है
41فَكَيْفَ إِذَا جِئْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍ بِشَهِيدٍ وَجِئْنَا بِكَ عَلَىٰ هَٰؤُلَاءِ شَهِيدًا
(ख़ैर दुनिया में तो जो चाहे करें) भला उस वक्त क्या हाल होगा जब हम हर गिरोह के गवाह तलब करेंगे और (मोहम्मद) तुमको उन सब पर गवाह की हैसियत में तलब करेंगे
42يَوْمَئِذٍ يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا وَعَصَوُا الرَّسُولَ لَوْ تُسَوَّىٰ بِهِمُ الْأَرْضُ وَلَا يَكْتُمُونَ اللَّهَ حَدِيثًا
उस दिन जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया और रसूल की नाफ़रमानी की ये आरज़ू करेंगे कि काश (वह पेवन्दे ख़ाक हो जाते) और उनके ऊपर से ज़मीन बराबर कर दी जाती और अफ़सोस ये लोग ख़ुदा से कोई बात उस दिन छुपा भी न सकेंगे
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अनुवाद — अन-निसा 40

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Tuesday, August 18, 2026

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