अन-निसा · 55/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
فَمِنْهُم مَّنْ آمَنَ بِهِ وَمِنْهُم مَّن صَدَّ عَنْهُ ۚ وَكَفَىٰ بِجَهَنَّمَ سَعِيرًا ۝٥٥
Faminhum man aamana bihee wa minhum man sadda `anh; wa kafaa bi Jahannama sa`eeraa
📖 हिंदी अर्थ
फिर कुछ लोग तो इस (किताब) पर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उससे इन्कार किया और इसकी सज़ा के लिए जहन्नुम की दहकती हुई आग काफ़ी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • صَدَّ عَنْهُ: उससे मुँह मोड़ा, उस पर ईमान नहीं लाया, और दूसरों को भी उससे रोका।
  • سَعِيرًا: भड़कती हुई आग, जो लगातार जलती रहे।

तफ़सीर (व्याख्या):

इन अहले-किताब (यहूद और ईसा) में से कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने हज़रत मुहम्मद ﷺ पर ईमान लाया और उनकी लाई हुई शिक्षाओं को अपनाया, जैसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथी। जबकि उनमें से कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने न केवल ईमान लाने से इनकार किया, बल्कि दूसरों को भी आप ﷺ की राह से रोका और आपकी सच्चाई को छिपाया। यह उनका रवैया उसी तरह था जैसा उनके पूर्वजों ने पैग़म्बरों के साथ किया था। ऐसे लोगों के लिए जहन्नम की भड़कती हुई आग ही काफी है, जो उन्हें उनके कुफ्र और सत्य से मुँह मोड़ने की सज़ा देगी। यह आग उनके लिए पूर्ण दंड है, और इससे बड़ी कोई सज़ा नहीं हो सकती।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. सत्य को स्वीकार करना ही सफलता की कुंजी है, चाहे वह किसी भी समुदाय से आए। जिन लोगों ने आप ﷺ पर ईमान लाया, वे सम्मानित हुए, और जिन्होंने इनकार किया, वे घाटे में रहे।
  2. यह आयत बताती है कि ईमान और इनकार का फैसला व्यक्ति की अपनी मर्ज़ी पर निर्भर है, और हर व्यक्ति अपने कर्मों का जिम्मेदार है।
  3. जहन्नम का ज़िक्र करके अल्लाह तआला बंदों को डराता है ताकि वे सत्य की राह अपनाएँ और अपने जीवन को सुधारें। यह अल्लाह की रहमत है कि उसने आगाह कर दिया, ताकि लोग अज़ाब से बच सकें।
  4. सत्य को छिपाना और दूसरों को रोकना बहुत बड़ा पाप है, क्योंकि यह न केवल अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए भी गुमराही का कारण बनता है।


📜 आयत 53-57 — अन-निसा

53أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّنَ الْمُلْكِ فَإِذًا لَّا يُؤْتُونَ النَّاسَ نَقِيرًا
क्या (दुनिया) की सल्तनत में कुछ उनका भी हिस्सा है कि इस वजह से लोगों को भूसी भर भी न देंगे
54أَمْ يَحْسُدُونَ النَّاسَ عَلَىٰ مَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۖ فَقَدْ آتَيْنَا آلَ إِبْرَاهِيمَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَآتَيْنَاهُم مُّلْكًا عَظِيمًا
या ख़ुदा ने जो अपने फ़ज़ल से (तुम) लोगों को (कुरान) अता फ़रमाया है इसके रश्क पर चले जाते हैं (तो उसका क्या इलाज है) हमने तो इबराहीम की औलाद को किताब और अक्ल की बातें अता फ़रमायी हैं और उनको बहुत बड़ी सल्तनत भी दी
55فَمِنْهُم مَّنْ آمَنَ بِهِ وَمِنْهُم مَّن صَدَّ عَنْهُ ۚ وَكَفَىٰ بِجَهَنَّمَ سَعِيرًا
फिर कुछ लोग तो इस (किताब) पर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उससे इन्कार किया और इसकी सज़ा के लिए जहन्नुम की दहकती हुई आग काफ़ी है
56إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِنَا سَوْفَ نُصْلِيهِمْ نَارًا كُلَّمَا نَضِجَتْ جُلُودُهُم بَدَّلْنَاهُمْ جُلُودًا غَيْرَهَا لِيَذُوقُوا الْعَذَابَ ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَزِيزًا حَكِيمًا
(याद रहे) कि जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया उन्हें ज़रूर अनक़रीब जहन्नुम की आग में झोंक देंगे (और जब उनकी खालें जल कर) जल जाएंगी तो हम उनके लिए दूसरी खालें बदल कर पैदा करे देंगे ताकि वह अच्छी तरह अज़ाब का मज़ा चखें बेशक ख़ुदा हरचीज़ पर ग़ालिब और हिकमत वाला है
57وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ۖ لَّهُمْ فِيهَا أَزْوَاجٌ مُّطَهَّرَةٌ ۖ وَنُدْخِلُهُمْ ظِلًّا ظَلِيلًا
और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम किए हम उनको अनक़रीब ही (बेहिश्त के) ऐसे ऐसे (हरे भरे) बाग़ों में जा पहुंचाएंगे जिन के नीचे नहरें जारी होंगी और उनमें हमेशा रहेंगे वहां उनकी साफ़ सुथरी बीवियॉ होंगी और उन्हे घनी छॉव में ले जाकर रखेंगे
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अनुवाद — अन-निसा 55

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Tuesday, August 18, 2026

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