अन-निसा · 67/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَإِذًا لَّآتَيْنَاهُم مِّن لَّدُنَّا أَجْرًا عَظِيمًا ۝٦٧
Wa izal la aatainaahum mil ladunnaaa ajran `azeemaa
📖 हिंदी अर्थ
और (दीन में भी) बहुत साबित क़दमी से जमे रहते और इस सूरत में हम भी अपनी तरफ़ से ज़रूर बड़ा अच्छा बदला देते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَدُنَّا: अपनी ओर से, अपने पास से।
  • أَجْرًا عَظِيمًا: बहुत बड़ा प्रतिफल, अपार इनाम।

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर ये मुनाफ़िक़ीन (कपटी) उस नसीहत पर अमल कर लेते जो उन्हें दी गई थी — यानी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की ओर रुजू करते, अपने झगड़े अल्लाह और रसूल की किताब और सुन्नत के अनुसार सुलझाते, और हुक्म की पालना में अपनी जान और माल की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते — तो हम उन्हें अपनी ओर से बहुत बड़ा अज्र (प्रतिफल) अता करते। यह अज्र दुनिया में भी होता (जैसे इज़्ज़त, सुकून, और अल्लाह की मदद) और आख़िरत में भी (जैसे जन्नत और अल्लाह की रज़ा)। यानी अल्लाह की राह पर चलने वालों के लिए उसके पास इनाम का ख़ज़ाना भरा पड़ा है, जो उनके अमल के बदले में उन्हें दिया जाता है।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह तआला अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है — वह उन पर मुश्किल काम लादना नहीं चाहता, बल्कि उनकी भलाई चाहता है और आसान रास्ता दिखाता है।
  2. अल्लाह की इबादत और उसके हुक्म की पालना में दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई है — दुनिया में इज़्ज़त और सुकून, और आख़िरत में जन्नत और अल्लाह की रज़ा।
  3. अल्लाह के पास इनाम का ख़ज़ाना असीमित है — वह अपने नेक बंदों को उनके अमल से कहीं बढ़कर अज्र देता है।
  4. यह आयत मुसलमान को तरग़ीब देती है कि वह अल्लाह की राह पर चलने में कभी कसर न छोड़े, क्योंकि उसका इनाम बहुत बड़ा है और उसका वादा सच्चा है।


📜 आयत 65-69 — अन-निसा

65فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوا فِي أَنفُسِهِمْ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا
पस (ऐ रसूल) तुम्हारे परवरदिगार की क़सम ये लोग सच्चे मोमिन न होंगे तावक्ते क़ि अपने बाहमी झगड़ों में तुमको अपना हाकिम (न) बनाएं फिर (यही नहीं बल्कि) जो कुछ तुम फैसला करो उससे किसी तरह दिलतंग भी न हों बल्कि ख़ुशी ख़ुशी उसको मान लें
66وَلَوْ أَنَّا كَتَبْنَا عَلَيْهِمْ أَنِ اقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ أَوِ اخْرُجُوا مِن دِيَارِكُم مَّا فَعَلُوهُ إِلَّا قَلِيلٌ مِّنْهُمْ ۖ وَلَوْ أَنَّهُمْ فَعَلُوا مَا يُوعَظُونَ بِهِ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ وَأَشَدَّ تَثْبِيتًا
(इस्लामी शरीयत में तो उनका ये हाल है) और अगर हम बनी इसराइल की तरह उनपर ये हुक्म जारी कर देते कि तुम अपने आपको क़त्ल कर डालो या शहर बदर हो जाओ तो उनमें से चन्द आदमियों के सिवा ये लोग तो उसको न करते और अगर ये लोग इस बात पर अमल करते जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है तो उनके हक़ में बहुत बेहतर होता
67وَإِذًا لَّآتَيْنَاهُم مِّن لَّدُنَّا أَجْرًا عَظِيمًا
और (दीन में भी) बहुत साबित क़दमी से जमे रहते और इस सूरत में हम भी अपनी तरफ़ से ज़रूर बड़ा अच्छा बदला देते
68وَلَهَدَيْنَاهُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا
और उनको राहे रास्त की भी ज़रूर हिदायत करते
69وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَأُولَٰئِكَ مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِم مِّنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ ۚ وَحَسُنَ أُولَٰئِكَ رَفِيقًا
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल की इताअत की तो ऐसे लोग उन (मक़बूल) बन्दों के साथ होंगे जिन्हें ख़ुदा ने अपनी नेअमतें दी हैं यानि अम्बिया और सिद्दीक़ीन और शोहदा और सालेहीन और ये लोग क्या ही अच्छे रफ़ीक़ हैं
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अनुवाद — अन-निसा 67

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Tuesday, August 18, 2026

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