अन-निसा · 68/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
وَلَهَدَيْنَاهُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا ۝٦٨
Wa lahadainaahum Siraatam mustaqeemaa
📖 हिंदी अर्थ
और उनको राहे रास्त की भी ज़रूर हिदायत करते

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَلَهَدَيْنَاهُمْ: और हम उन्हें मार्गदर्शन देते
  • صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا: सीधा (सत्य) मार्ग

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला बताते हैं कि यदि वे मुनाफ़िक़ (कपटी) लोग, जिन्हें ताग़ूत (अत्याचारी शासक) के पास फ़ैसला कराने का आदेश दिया गया था, अल्लाह के आदेशों का पालन करते — जैसे आपस में लड़ना या अपने घरों से निकलना — तो यह उनके लिए बेहतर होता और उनके ईमान को मज़बूती प्रदान करता। लेकिन उनमें से बहुत कम लोगों ने ही इसका पालन किया। अल्लाह फ़रमाते हैं कि अगर वे ऐसा करते, तो हम उन्हें अपनी ओर से बड़ा प्रतिफल देते और उन्हें सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन करते — यानी उन्हें वह रास्ता दिखाते जो उन्हें अल्लाह की रज़ा और जन्नत तक पहुँचाता। यह मार्गदर्शन उनके अच्छे कर्मों के परिणामस्वरूप मिलता, जिससे उनका ईमान और अधिक दृढ़ होता और वे सत्य के और निकट आ जाते। यहाँ "सीधा मार्ग" से तात्पर्य इस्लाम का वह मार्ग है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में सफलता तक पहुँचाता है।

फ़ायदे:

  1. अल्लाह की आज्ञा का पालन करने से इंसान के ईमान में मज़बूती आती है और उसका विश्वास और अधिक पक्का होता है।
  2. अल्लाह तआला अपने वफ़ादार बंदों को न केवल आख़िरत में बल्कि दुनिया में भी सीधे मार्ग की तौफ़ीक़ देता है।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि कठिन आदेशों का पालन करने में ही भलाई है, और जो अल्लाह के आदेशों पर चलता है, अल्लाह उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता।
  4. सीधा मार्ग पाना अल्लाह की ओर से एक विशेष अनुग्रह है, जो उन्हीं को मिलता है जो अल्लाह की राह में अपनी जान और माल कुर्बान करने के लिए तैयार रहते हैं।
  5. यह आयत मुसलमानों को प्रोत्साहित करती है कि वे अल्लाह के आदेशों को अपनी समझ से बेहतर मानें और उन पर अमल करें, क्योंकि अल्लाह ही सबसे अच्छा जानने वाला है।


📜 आयत 66-70 — सूरा अन-निसा

66وَلَوْ أَنَّا كَتَبْنَا عَلَيْهِمْ أَنِ اقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ أَوِ اخْرُجُوا مِن دِيَارِكُم مَّا فَعَلُوهُ إِلَّا قَلِيلٌ مِّنْهُمْ ۖ وَلَوْ أَنَّهُمْ فَعَلُوا مَا يُوعَظُونَ بِهِ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ وَأَشَدَّ تَثْبِيتًا
(इस्लामी शरीयत में तो उनका ये हाल है) और अगर हम बनी इसराइल की तरह उनपर ये हुक्म जारी कर देते कि तुम अपने आपको क़त्ल कर डालो या शहर बदर हो जाओ तो उनमें से चन्द आदमियों के सिवा ये लोग तो उसको न करते और अगर ये लोग इस बात पर अमल करते जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है तो उनके हक़ में बहुत बेहतर होता
67وَإِذًا لَّآتَيْنَاهُم مِّن لَّدُنَّا أَجْرًا عَظِيمًا
और (दीन में भी) बहुत साबित क़दमी से जमे रहते और इस सूरत में हम भी अपनी तरफ़ से ज़रूर बड़ा अच्छा बदला देते
68وَلَهَدَيْنَاهُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا
और उनको राहे रास्त की भी ज़रूर हिदायत करते
69وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَأُولَٰئِكَ مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِم مِّنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ ۚ وَحَسُنَ أُولَٰئِكَ رَفِيقًا
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल की इताअत की तो ऐसे लोग उन (मक़बूल) बन्दों के साथ होंगे जिन्हें ख़ुदा ने अपनी नेअमतें दी हैं यानि अम्बिया और सिद्दीक़ीन और शोहदा और सालेहीन और ये लोग क्या ही अच्छे रफ़ीक़ हैं
70ذَٰلِكَ الْفَضْلُ مِنَ اللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ عَلِيمًا
ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है और ख़ुदा तो वाक़िफ़कारी में बस है
अन-निसाकुरान सूची
176आयत
मदनीअवतरण स्थान
68आयत

अनुवाद — अन-निसा 68

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Wednesday, September 30, 2026

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