अज़-ज़ुखरुफ · 77/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
وَنَادَوْا يَا مَالِكُ لِيَقْضِ عَلَيْنَا رَبُّكَ ۖ قَالَ إِنَّكُم مَّاكِثُونَ ۝٧٧
Wa naadaw yaa Maaliku liyaqdi `alainaa Rabbuka qaala innakum maakisson
📖 हिंदी अर्थ
और (जहन्नुमी) पुकारेगें कि ऐ मालिक (दरोग़ा ए जहन्नुम कोई तरकीब करो) तुम्हारा परवरदिगार हमें मौत ही दे दे वह जवाब देगा कि तुमको इसी हाल में रहना है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नादौ (नाद किया): चिल्लाकर पुकारा।
  • या मालिकु: जहन्नम (नरक) के दारोगा (ख़ाज़िन) को संबोधित करते हुए।
  • लियक़्दी अलैना: हमारे ऊपर मौत का फ़ैसला कर दे, यानी हमें मौत दे दे।
  • माकिसून: हमेशा रहने वाले, स्थायी रूप से ठहरने वाले।

विस्तृत तफ़सीर:

जब अत्याचारी और अपराधी लोग जहन्नम में डाल दिए जाएंगे और वहाँ के अज़ाब (यातना) की भयावहता उन पर हावी हो जाएगी, और वे देखेंगे कि उनके लिए कोई राहत नहीं, कोई छुटकारा नहीं, तो वे जहन्नम के दारोगा "मालिक" को पुकारेंगे। वे चिल्लाकर कहेंगे: "ऐ मालिक! अपने रब से हमारे लिए मौत का फ़ैसला करवा दे, ताकि हम इस अज़ाब से छुटकारा पा सकें।" वे मौत को भी अपने लिए राहत समझेंगे, क्योंकि जीवन में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मौत भी किसी के लिए नेमत बन सकती है। लेकिन वहाँ उनकी यह दुआ भी क़बूल नहीं होगी।

जवाब में मालिक उनसे कहेंगे: "तुम हमेशा यहीं रहोगे। तुम्हारे लिए मौत नहीं है, और न ही अज़ाब में कोई कमी होगी। तुम इसी स्थिति में सदैव पड़े रहोगे।" यह उनके लिए सबसे बड़ी सज़ा होगी कि मौत भी उन्हें नसीब नहीं होगी, और अज़ाब से छुटकारे की कोई सूरत भी नहीं होगी।

यह वही लोग हैं जिनके पास दुनिया में अल्लाह के रसूल सच्चाई और स्पष्ट प्रमाणों के साथ आए, लेकिन उन्होंने उसे झुठलाया और उससे नफ़रत की। उन्होंने हक़ को सुनकर भी उसे क़बूल नहीं किया, बल्कि उससे मुँह मोड़ा। आज वे अपनी उसी हठधर्मिता और अहंकार का फल भुगत रहे हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें अल्लाह के अज़ाब से डराती है और बताती है कि जो लोग दुनिया में हक़ को नकारते हैं और अल्लाह के दीन से मुँह मोड़ते हैं, उनका अंजाम कितना भयानक होगा। लेकिन साथ ही यह भी सिखाती है कि अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा अभी खुला है। जब तक हम दुनिया में हैं, हमें अपनी ज़िंदगी को संवारने का मौक़ा मिला हुआ है। हमें चाहिए कि हम अल्लाह के हुक्मों को मानें, उसके रसूल की सुन्नत पर चलें, और अपने आप को उस आग से बचाएँ जिसकी ईंधन लोग और पत्थर हैं। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि इस दुनिया की मुहब्बत और इसके सुख-साधन हमें उस आख़िरत के सुखों से ग़ाफ़िल न कर दें। आज हमारे पास तौबा का मौक़ा है, रहमत की भीख माँगने का समय है — कल यह समय हाथ से निकल जाएगा और फिर सिर्फ़ पछतावा और अफ़सोस ही बचेगा। अल्लाह हम सबको उस अज़ाब से बचाए और अपनी रहमत के साये में ले, आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 75-79 — अज़-ज़ुखरुफ

75لَا يُفَتَّرُ عَنْهُمْ وَهُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ
जो उनसे कभी नाग़ा न किया जाएगा और वह इसी अज़ाब में नाउम्मीद होकर रहेंगें
76وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلَٰكِن كَانُوا هُمُ الظَّالِمِينَ
और हमने उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया बल्कि वह लोग ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म कर रहे हैं
77وَنَادَوْا يَا مَالِكُ لِيَقْضِ عَلَيْنَا رَبُّكَ ۖ قَالَ إِنَّكُم مَّاكِثُونَ
और (जहन्नुमी) पुकारेगें कि ऐ मालिक (दरोग़ा ए जहन्नुम कोई तरकीब करो) तुम्हारा परवरदिगार हमें मौत ही दे दे वह जवाब देगा कि तुमको इसी हाल में रहना है
78لَقَدْ جِئْنَاكُم بِالْحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَكُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ
(ऐ कुफ्फ़ार मक्का) हम तो तुम्हारे पास हक़ लेकर आयें हैं तुम मे से बहुत से हक़ (बात से चिढ़ते) हैं
79أَمْ أَبْرَمُوا أَمْرًا فَإِنَّا مُبْرِمُونَ
क्या उन लोगों ने कोई बात ठान ली है हमने भी (कुछ ठान लिया है)
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
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77आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 77

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Tuesday, August 18, 2026

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